मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ मयमतम् उपपीठक्रियायोगः शोभारक्षणवर्धकः। तस्मात्तत्कल्पनं शस्तं निर्माणे बहुरूपके।।१।। इसे अधिष्ठान के नीचे एवं अधिष्ठान के ऊपर ( स्तम्भ के नीचे ) एवं अन्यत्र निर्मित किया जाता है— स्थलभेदात्क्रियाभेदादधिष्ठानस्य चोर्ध्वके।।२।। प्रमाणभेद से यह उत्तम, मध्यम एवं अधम होता है एवं जाति-भेद ( शैलीभेद ) से सात प्रकार का होता है। इनमें प्रस्तरनिर्मित उपपीठ प्रतिभद्र, वाजिभद्र एवं मञ्चभद्र हैं, काष्ठनिर्मित उपपीठ सूर्यभद्र एवं चन्द्रभद्र तथा धातुनिर्मित उपपीठ गन्धर्वभद्र एवं देवेशभद्र हैं— प्रतिभद्रं वाजिभद्रं मञ्चभद्रन्तु शैलजम्। सूर्यभद्रं चन्द्रभद्रं दारुकार्ये प्रयोजयेत्।।४।। गन्धर्वभद्रं देवेशभद्रं लोहक्रियार्हकम्। सप्तस्वपि च शैलीषु योज्यमेतत्प्रकीर्तितम्।।५।। (ख) शिल्परत्न ( पूर्व भाग-१८ ) में अधिष्ठान के नीचे उपपीठ की रचना का उद्देश्य रक्षा, भवन की ऊँचाई एवं शोभा वर्णित है— अधिष्ठानस्य चाधस्तादुपपीठं प्रयोजितम्। रक्षार्थमुन्नत्यर्थं वा शोभार्थं च प्रकल्पयेत्।।२५।। वहाँ उसके प्रमाण का भी विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। (ग) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( ५ ) में भी इसके निर्माण का पूर्वोक्त उद्देश्य वर्णित है। इसे अधिष्ठान से एक हाथ चौड़ा एवं आठ अङ्गुल मोटा कहा गया है— रक्षाशोभोच्छ्रयार्थं सकलनिलयमासूरतोऽधः समन्तात्। कुर्यादेकहस्तप्रविततमुपपीठं गजाद्यङ्गुलाढ्यम्।।२।। इसकी ऊँचाई अधिष्ठान के बराबर या छः, सात, आठ या नौ अंश कम होनी चाहिये— गेहाधिष्ठानोच्चतुल्यो रसाद्यष्टाङ्गांशांशैरूनितो वा यथेष्टम्। मर्त्यागारस्योपपीठोच्छ्रयः स्यात्तत्तद्भागैः पादुकाद्यं विधेयम्।।३।। उपपीठ-निर्माण के विषय में मानसार ( १३ ) एवं ईशानशिवगुरुदेवपद्धति ( क्रिया- ३०.६८ ) में भी वर्णन प्राप्त होता है।