भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

अथ चतुर्दशोऽध्यायः ( अधिष्ठानविधानम् ) ✵ अधिष्ठानवस्तुनिर्माणम् ✵ तैतिलानां द्विजातीनां वर्णानां गृहकर्मणि। तद्योग्यं द्विविधं वस्तु जाङ्गलानूपभेदतः ॥१॥ अधिष्ठान का निर्माण—देवों, ब्राह्मणों एवं अन्य वर्ण वालों के गृह-निर्माण के अनुरूप दो प्रकार की भूमि—जाङ्गल ( सूखी ) एवं अनूप ( स्निग्ध ) होती है। घनशर्करया युक्तमत्यन्तं खनने खरम्। सितांशतनुतोयाढ्यं जाङ्गलं भूतलं भवेत् ॥२॥ जाङ्गल भूमि अत्यन्त कंकरीली होती है एवं खोदने में कड़ी होती है। इसमें खुदाई के पश्चात् अत्यन्त स्वच्छ, चन्द्रमा के सदृश जल प्राप्त होता है॥२॥ खननं क्रियमाणस्य वस्तुनश्च बलं यथा। रूढोत्पलकृशेर्वारुसंयुक्तं तनुवालुकम् ॥३॥ अनूपमिति विख्यातं खात्वैव जलदर्शनम्। भवन की योजना के अनुरूप खुदाई करने पर नील कमल एवं ककड़ी से युक्त महीन बालू प्राप्त होते हैं। ऐसी भूमि को अनूप कहते हैं। इसमें खुदाई करते ही जल दिखाई पड़ने लगता है॥३॥ इष्टकोपलमृद्भिश्च वालुकैरपि चिक्रणैः ॥४॥ शर्कराभिः क्रमाच्छ्वभ्रं निश्छिद्रं पूरयेत् स्थिरम्। घनीकृत्येभपादैश्च काष्ठखण्डैर्बृहत्तरैः ॥५॥ ( जलदर्शन के पश्चात् ) गड्ढे को ईंटों, प्रस्तर, मिट्टी, चिकने बालू एवं कङ्कड़ से भरना चाहिये। इन्हें इस प्रकार भरना चाहिये, जिससे कि खोदा गया गड्ढा छेदरहित एवं दृढ़ हो जाय। इसे गजपाद से एवं बड़े काष्ठखण्डों से ( कूट-पीट कर ) सघन बना देना चाहिये॥४-५॥