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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१२६ मयमतम् तत्खाते सलिलेनैव पूरितेऽक्षयता शुभा। समत्वं सलिलेनैव साधयित्वा विचक्षणः ॥६॥ गर्भं प्रक्षिप्य तं नीत्या होमं तत्र निधापयेत्। उस गर्त को ( कङ्कड़ आदि से भरने के बाद शेष बचे गड्ढे को ) जल से भरना चाहिये। जल के क्षीण न होने पर शुभ होता है। बुद्धिमान ( स्थपति ) को जल से ही भूमि के समान होने ( समतल होने ) की परीक्षा करने के पश्चात् गर्त में गर्भ-न्यास करना चाहिये। इसके पश्चात् नियमपूर्वक वास्तु-होम करना चाहिये॥६॥ स्तम्भद्वित्रिगुणव्यासं तदर्धं बहलान्वितम् ॥७॥ उपानोपरि पद्मं चोपोपानं च तदूर्ध्वतः। यथाशोभांशमानेन कुर्यात्तत्र विचक्षणः ॥८॥ उस स्थान पर स्तम्भ का दुगुना या तीन गुना व्यास वाला एवं उसका आधा मोटाई वाला बहल से युक्त उपान स्थापित करना चाहिये। उसके ऊपर बुद्धिमान ( स्थपति ) को उपान के अनुरूप प्रमाण का पद्म तथा उपोपान निर्मित करना चाहिये॥७-८॥ उन्नतां प्रकृतिं भूमिं कृत्वा हस्तप्रमाणतः। घनीकृत्य तदूर्ध्वस्थमुपानं जन्म चोच्यते ॥९॥ भूमि को एक हाथ के प्रमाण से ऊँचा बनाकर एवं सघन कर उसके ऊपर जिस उपान को स्थापित किया जाता है, उसे जन्म कहते हैं॥९॥ तदूर्ध्वस्थमधिष्ठानं सोपपीठं तु केवलम्। सस्तम्भं वा सकुड्यं वा जङ्घावर्गं तदूर्ध्वगम् ॥१०॥ उसके ऊपर उपपीठ से युक्त अधिष्ठान स्थापित करना चाहिये एवं उसके ऊपर स्तम्भ, भित्ति अथवा जङ्घा निर्मित होनी चाहिये॥१०॥ भूमिदेश इति ख्याता कपोतोर्ध्वगता प्रतिः। प्रासादादीनि वास्तूनि चाधितिष्ठन्ति यद्धि तत् ॥११॥ जिस पर प्रासाद आदि भवन स्थित रहते हैं एवं जिससे कपोत ( भवन का एक भाग ) के ऊपर प्रति ( भवन का अङ्ग ) निर्मित होता है, उसे भूमिदेश कहते हैं॥११॥ ✺ अधिष्ठानोन्मानम् ✺ अधिष्ठानं तदुन्मानं जातिभूमिवशाद् द्विधा। तैतिलानां चतुर्हस्तं त्रिहस्तार्धं द्विजन्मनाम् ॥१२॥ अधिष्ठान की ऊँचाई का प्रमाण—अधिष्ठान की ऊँचाई का प्रमाण भूमि

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