मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १२७ ( तल ) के एवं जाति के अनुसार दो प्रकार का होता है। देवालय में यह चार हाथ का एवं ब्राह्मणगृह में साढ़े तीन हाथ का होता है॥१२॥ नृपाणां त्रिकरं सार्धद्विहस्तं यौवराजकम्। द्विहस्तं वणिजामेकहस्तं शूद्रस्य कीर्त्यते॥१३॥ राजा के भवन में तीन हाथ, युवराज के भवन में ढाई हाथ, वैश्यों के भवन में दो हाथ एवं शूद्र के भवन में एक हाथ का अधिष्ठान कहा गया है॥१३॥ एतज्जातिवशाद् भूमिवशात्तैव कथ्यते। दण्डात् षण्मात्रहान्या तु द्वादशाद्यात्रिभूमिकम्॥१४॥ अधिष्ठान की ऊँचाई का यह प्रमाण जाति के अनुसार वर्णित है। भूमि ( तल ) के अनुसार अधिष्ठान का माप इस प्रकार है—बारह भूमि से प्रारम्भ कर छः-छः अंश प्रत्येक भूमि में कम करते हुये तीन भूमिपर्यन्त भवन में अधिष्ठान ( की ऊँचाई ) एक दण्ड होना चाहिये॥१४॥ त्रितलस्योत्तमस्येष्टं पादेनो नं द्विहस्तकम्। क्षुद्राणामनया नीत्या विधातव्यं विचक्षणैः॥१५॥ तीन तल के भवन में उत्तम अधिष्ठान प्रशस्त होता है। उसका माप चतुर्थांश कम दो हांथ होता है। इससे छोटे अधिष्ठान का प्रयोग छोटे भवनों में विद्वानों द्वारा वर्णित नीति के अनुसार करना चाहिये॥१५॥ तत्तत्पादोदयार्धेन षडष्टांशोनमानतः। अधिष्ठानस्य चोत्सेधं वास्तुवस्तुनि भूवशात्॥१६॥ यह मान भवन के स्तम्भ के आधे प्रमाण से छः या आठ भाग कम होना चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई का प्रमाण भवन के तल के अनुसार रखना चाहिये॥१६॥ यदुपानस्य निष्क्रान्तं तत् त्र्यंशेन विभाजयेत्। त्यक्त्वैकांशं बहिस्तत्र जगतीं कारयेद् बुधः॥१७॥ उपान के निष्क्रान्त के तीन भाग करने चाहिये। उसके एक भाग को छोड़ कर जगती ( अधिष्ठान ) का निर्माण करना चाहिये॥१७॥ तद्वत् कुमुदपट्टं च तद्वत् कण्ठस्य वेशनम्। आत्तोत्सेधांशमानं तु भागमानेन वक्ष्यते॥१८॥ इसी प्रकार कुमुदपट्ट एवं कण्ठ का भी निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार अधिष्ठान की ऊँचाई पर्यन्त प्रत्येक भाग का प्रमाण वर्णित है॥१८॥