भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१२८ मयमतम् ✵ पादबन्धम् ✵ अष्टसप्तशशिबन्धभागिकश्चन्द्रबन्धशशिभागिकैः क्रमात्। वप्रकं कुमुदकम्पकन्धरं कम्पवाजनमधोर्ध्वकम्पकम् ॥१९॥ पादबन्ध अधिष्ठान—पादबन्ध के भागों के नाम एवं प्रमाण इस प्रकार हैं— वप्र आठ भाग, कुमुद सात भाग, कम्प एक भाग, कन्धर तीन भाग, कम्प एक भाग, वाजन तीन भाग तथा एक भाग में अधोकम्प एवं ऊर्ध्वकम्प।।१९।। पादबन्धमुदितं तदुच्छ्रये भानुभिर्द्विगुणितांशके कृते। देवविप्रनृपवैश्यशूद्रकेष्वेवमुक्तमृषिभिः पुरातनैः ॥२०॥ इस प्रकार ऊँचाई में चौबीस भागों में बाँटे गये पादबन्ध का वर्णन प्राचीन ऋषियों द्वारा किया गया है, जो देवों, ब्राह्मणों, राजाओं ( क्षत्रियों ) वैश्यों एवं शूद्रों के भवन के अनुकूल है।।२०।। ✵ उरगबन्धम् ✵ चन्द्रदृक्शशिशिवांशकै रसैर्धातुभिश्च समभागिकैः क्रमात्। वाजनं प्रतिमुखं त्रियस्त्रकं दृक् च वृत्तकुमुदं तु वप्रकम् ॥२१॥ त्रिःषडंशसमभागिके तले नागवक्त्रसदृशं प्रतिद्वयम्। देवविप्रनृपमन्दिरेषु तद्योग्यकं ह्युरगबन्धकं भवेत् ॥२२॥ उरगबन्ध अधिष्ठान—ऊँचाई में अठारह भागों में विभाजित उरगबन्ध अधिष्ठान के दो प्रति नाग-मुख के सदृश होते हैं। इसमें वाजन एक भाग, प्रतिमुख दो भाग, त्रियस्त्रक एक भाग, दृक् तीन भाग, वृत्तकुमुद छः भाग एवं वप्रक पाँच भाग से निर्मित होता है। यह देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के भवनों के योग्य होता है।।२१-२२।। ✵ प्रतिक्रमम् ✵ अंशाध्यर्धार्धभागैर्मु निरसशशिभिश्चन्द्रदृक्छैवभागैः क्षुद्रोपानाब्जकम्पं जगतिकुमुदकं धारया युक्तमूर्ध्वे। आलिङ्गान्तादिकं तत्प्रतिमुखमथ तद्वाजनं पद्मयुक्तं त्रिःसप्तांशे तलोच्चे करिहरिमकरव्यालरूपादिभूष्यम् ॥२३॥ प्रतिक्रम अधिष्ठान—प्रतिक्रम अधिष्ठान की ऊँचाई के इक्कीस भाग करने चाहिये। एक भाग से क्षुद्रोपान, डेढ़ भाग से अब्ज, आधे भाग से कम्प, सात भाग से जगती, छः भाग से धारायुक्त कुमुद, एक भाग से आलिङ्गान्त, एक भाग से आलिङ्गादि, दो भाग से प्रतिमुख एवं एक भाग से पद्मयुक्त वाजन का निर्माण करना चाहिये। अधिष्ठान पर गज, सिंह, मकर एवं व्याल आदि का आभूषण के रूप में अंकन करना चाहिये।।२३।।