भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३७ मञ्चकान्यधमान्याहुः पादबन्धाभिधानि वै। मध्यमान्युत्तमानि स्युः प्रतिबन्धान्यसंशयः।। (१९.२) इसके पाँच वर्ग हैं—उपान, जगती, कुम्भ, कन्धर एवं प्रस्तर— उपानं जगती कुम्भं कन्धरं प्रस्तरं तथा। पञ्चवर्गमिति ख्यातमाद्यङ्गानां विशेषतः।। (१९.३) मञ्चक, पादबन्ध एवं प्रतिबन्ध का सामान्य लक्षण इस प्रकार है— कुमुदेन विना कार्यं यत्तन्मञ्चकमुच्यते। पादबन्धतलानां तु वस्वस्रं कुमुदं भवेत्।। सर्वेषां प्रतिबन्धानां कुमुदं वृत्तमुच्यते। (१९.५) अधिष्ठान की एवं उपपीठ की रचना मृत्तिका, ईंट, शिला अथवा काष्ठ से भवनादि की आवश्यकता देखते हुये करनी चाहिये— अधिष्ठानं चोपपीठं मृदा चेष्टकयापि वा। शिलाभिर्वा विधातव्यं दारुणा वा यथाबलम्।। (वही-१८.२०) (ज) मानसार (अ. १४) में अधिष्ठानों के भेद एवं अनके अङ्गों का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। इनमें उरगबन्ध, प्रतिक्रम, कुमुदबन्ध, श्रीबन्ध, मञ्चबन्ध, श्रेणीबन्ध, पद्मबन्ध, कुम्भबन्ध, वप्रबन्ध, वज्रबन्ध, श्रीभोग, रत्नबन्ध, पट्टबन्ध, कुक्षिबन्ध, कम्पबन्ध, एवं श्रीकान्त आदि अधिष्ठानों का वर्णन किया गया है। अधिष्ठानप्रतिच्छेद (श्लोक ४४-४५) अधिष्ठान के छेदन के विषय में अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार उल्लेख प्राप्त होता है— (क) शिल्परत्न (पूर्वभाग-१९.१२९-१३१) द्वारार्थं वा स्थलार्थं वा जलमार्गार्थमेव वा। जन्मादिपञ्चवर्गेषु तत्तदङ्गावसानके।। छेदनं नैव दोषाय पादबन्धतलेऽखिले। प्रतेशच्छेदं न कर्तव्यं प्रतिबन्धकुले कदाचन।। जन्मच्छेदं न कर्तव्यं यत्र-कुत्रापि सर्वतः। विपदामास्पदं ह्येतत्तस्मान्नैव कारयेत्।। (ख) ईशानशिवगुरुदेवपद्धति (क्रिया.-३१.१०१-२) सर्वत्र प्रत्युपरि द्वारं कुर्याद् विचक्षणः। प्रतिच्छेदेन तु द्वारं न कुर्वीत कदाचन।।