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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 395 में से

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पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४३ कुम्भोच्छ्रये नवांशे धृग्भागेन चतुरंशकैः । कमलं कण्ठमंशेन भागेनास्यं प्रकीर्तितम् ॥३२॥ भागेन पद्ममर्धेन वृत्तमर्धेन हीरकौ । हीरौ पादसमव्यासौ तत्कर्णेनास्यविस्तृतम् ॥३३॥ कुम्भ की ऊँचाई के नौ भाग करने चाहिये। इसमें एक भाग से धृग्, चार भाग से कमल, एक भाग से कण्ठ, एक भाग से मुख, एक भाग से पद्म, आधा भाग से वृत्त एवं आधा भाग से दो हीरकों का निर्माण करना चाहिये। हीरकों का व्यास स्तम्भ की चौड़ाई के बराबर एवं मुख उसके कर्ण तक विस्तृत होना चाहिये ।। ३२-३३ ।। तत्कर्णं कुम्भविस्तारं तत्कर्णं फलकायतम् । अथवा फलकायामं चतुर्दण्डं त्रिदण्डकम् ॥३४॥ कर्ण फलक के बराबर चौड़ा होना चाहिये एवं कर्ण के बराबर कुम्भ का विस्तार रखना चाहिये अथवा फलक का विस्तार चार दण्ड या तीन दण्ड होना चाहिये ।। ३४ ।। सार्धत्रिदण्डमायाममुत्सेधाख्यं त्रिदण्डकम् । तदुत्सेधे त्रिभागे तु भागेनोत्सन्धिरिष्यते ॥३५॥ अथवा साढ़े तीन दण्ड विस्तार होना चाहिये एवं उसकी ऊँचाई तीन दण्ड रखनी चाहिये। ऊँचाई को तीन बराबर भागों में बाँटना चाहिये। ऊर्ध्व भाग की निर्मिति ( उत्सन्धि ) एक भाग से करनी चाहिये ।। ३५ ।। भागेन वेत्रमंशेन पद्मं पाल्याभमिष्यते । नागवक्त्रसमाकारमावेत्रात् पादरूपवत् ॥३६॥ एक भाग से वेत्र एवं एक भाग से अन्दर की ओर मुड़ा पद्म होना चाहिये। यह कुम्भ स्तम्भ की आकृति के समान वेत्र से नागवक्त्र के आकार का होना चाहिये ।। ३६ ।। पादविस्तारविस्तारं धृक्कण्ठं वीरकाण्डकम् । सर्वेषामपि पादानां वीरकाण्डं युगास्त्रकम् ॥३७॥ स्तम्भ के विस्तार के समान धृक्, कण्ठ एवं वीरकाण्ड का विस्तार रखना चाहिये। सभी स्तम्भों का वीरकाण्ड चौकोर होना चाहिये ।। ३७ ।। तदुत्सेधत्रिपा दोनं दण्डोत्थं स्कन्धमिष्यते । तदधस्तु तदर्धेन पद्मं पत्रविचित्रितम् ॥३८॥ मालास्थानमधस्तस्माद् दण्डमानसमुन्नतिः । उसकी ( वीरकाण्ड की ) ऊँचाई से पौन भाग कम ( एक चौथाई अथवा ) एक

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