भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५१ निर्मित भवन की संज्ञा 'सङ्कीर्ण' होती है। पहले वर्णित नियमों के अनुसार निर्मित भवन सम्पत्ति प्रदान करता है॥७९-८०॥ ✵ वृक्षसंग्रहणम् ✵ सर्वद्वारिकनक्षत्रे शुभपक्षमूहूर्तके । गच्छेदरण्यं द्रव्यार्थी कृतकौतुकमङ्गलः॥८१॥ काष्ठ हेतु वृक्ष का संग्रह—(गृहनिर्माण हेतु काष्ठ के संग्रह के लिये) पदार्थों की कामना रखने वाले (गृहस्वामी) को शुभ कृत्य करके सर्वद्वारिक नक्षत्र में शुभ (शुक्ल) पक्ष में एवं शुभ मुहूर्त में वन की ओर प्रस्थान करना चाहिये॥८१॥ निमित्तैः शकुनैर्योग्यैः सह मङ्गलशब्दकैः । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैश्च मांसेन कृसरेण च॥८२॥ पायसौदनमत्स्यैश्च भक्ष्यैश्चापि पृथग्विधैः । अर्चयेदीप्सितान् सर्वान् वृक्षांश्च वनदेवताः॥८३॥ अच्छे लक्षणों वाले शकुनों एवं मङ्गलध्वनि के साथ वनदेवताओं एवं सभी अभीष्ट वृक्षों की गन्ध, पुष्प, धूप, मांस, खिचड़ी, दूध, भात, मछली एवं विविध प्रकार की भोज्य सामग्रियों से पूजा करनी चाहिये॥८२-८३॥ भूतक्रूरबलिं दत्त्वा कर्मयोग्यद्रुमं हरेत् । मूलाग्रादार्जवं वृत्तं शाखानेकसन्वितम्॥८४॥ (वृक्षों में निवास करने वाले) भूतों (प्रेत, पिशाच, ब्रह्म आदि) के लिये क्रूर बलि (रक्त, मांस आदि) देकर अपने कार्य के अनुकूल वृक्ष का चयन करना चाहिये। ये वृक्ष जड़ से शिरोभाग तक सीधे, गोलाकार एवं अनेक शाखाओं से युक्त होने चाहिये॥८४॥ तत्तु पुंस्त्वं भवेन्मूले स्थूलं स्त्रीत्वं कृशाग्रकम् । स्थूलाग्रं कृशमूलं तु षण्डमेतदुदीरितम्॥८५॥ उपर्युक्त वृक्ष 'पुरुष' होते हैं। जो वृक्ष मूल में स्थूल एवं ऊर्ध्व भाग में पतले होते हैं, वे 'स्त्री' वृक्ष हैं तथा जिनका मूल कृश एवं ऊर्ध्व भाग स्थूल हो, वे वृक्ष 'षण्ड' (नपुंसक) होते हैं॥५८॥ मुहूर्तस्तम्भमुद्दिश्य पुम्भूरुह उदीरितः । सर्वेष्वङ्गेषु वस्तूनां पुंस्त्रीषण्डं प्रकीर्तितम्॥८६॥ 'मुहूर्तस्तम्भ' (शिलान्यास के स्थान पर स्थापित होने वाला स्तम्भ) पुरुष वृक्ष