मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० मयमतम् दो वृक्ष आपस में लिपटे हुये हों, टूटे हों, दीमक लगे हों, उस वृक्ष से घनी लता लिपटी हो तथा उस वृक्ष पर पक्षियों के घोसले हों इस प्रकार के वृक्ष भवन के लिये अग्राह्य होते हैं।।७४।। नाङ्कुरावृतसर्वाङ्गा न भृङ्गकीटदूषिताः । नाकालफलिनो ग्राह्या न श्मशानसमीपगाः ॥७४॥ जिस वृक्ष के सभी अङ्गों पर अङ्कुर निकले हों, भ्रमरों तथा कीटों से दोषयुक्त, विना समय फलने वाले तथा श्मशान के समीप उगे वृक्ष ( गृहनिर्माण के लिये ) ग्राह्य नहीं होते हैं।।७५।। सभाचैत्यसमीपस्था देवादीनां न भूरुहाः । वापीकूपतटाकादिवस्तुष्वपि च सम्भवाः ॥७६॥ सभागार एवं चैत्य ( ग्राम का पूजनीय स्थल ) के समीप तथा देवालय के समीप उगे वृक्ष तथा वापी, कूप एवं तालाब आदि निर्माण-स्थलों पर उगे वृक्ष भी ( भवन- निर्माण के लिये ) ग्राह्य नहीं होते हैं।।७६।। विनष्टवस्तुसञ्जातद्रव्यं सर्वविपत्करम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुद्धं द्रव्यं प्रगृह्यताम् ॥७७॥ अग्राह्य वृक्षादि से निर्मित पदार्थ ( जब भवन में प्रयुक्त होते हैं तो ) सभी प्रकार की विपत्तियों के कारक बनते हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक शुद्ध पदार्थों को ही लेना चाहिये।।७७।। शिला देवालये ग्राह्या द्विजावनिपयोर्मताः । पाषण्डिनां च कर्तव्या न कुर्याद्वैश्यशूद्रयोः ॥७८॥ प्रस्तर का प्रयोग देवालय, ब्राह्मण, राजा तथा पाषण्डियों ( विधर्मी ) के गृह में होना चाहिये; किन्तु वैश्य एवं शूद्र के भवन में नहीं करना चाहिये।।७८।। कर्तव्यं यदि तद्वास्तु धर्मकामार्थनाशकृत् । एकद्रव्यकृतं शुद्धं मिश्रं द्विद्रव्यनिर्मितम् ॥७९॥ त्रिद्रव्यसंयुतं यत्तु तत् सङ्कीर्णमुदाहृतम् । पूर्वोदितानां वासेषु कर्तव्यं सम्पदां पदम् ॥८०॥ यदि उस प्रकार का ( वैश्य एवं शूद्र के भवन में शिलाप्रयोग ) भवन निर्मित किया गया तो वह धर्म, काम एवं अर्थ का नाश करता है। एक पदार्थ से निर्मित भवन की संज्ञा 'शुद्ध', दो द्रव्य से निर्मित भवन 'मिश्र' तथा तीन द्रव्य-मिश्रित पदार्थ से