भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 395 में से

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'गञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५७ चतुष्पञ्चषडष्टाभिर्मात्रैस्तद्द्विगुणायतः ॥११८॥ व्यासार्धार्धत्रिभागैकतीव्रा मध्ये परेऽपरे। इष्टका बहुशः शोष्याः समदग्धाः पुनश्च ताः ॥११९॥ ( उपर्युक्त विधि से तैयार की गई मिट्टी से ) चार, पाँच, छः या आठ अङ्गुल चौड़ी, चौड़ाई की दुगुनी लम्बी तथा चौड़ाई की चतुर्थांश, आधा अथवा तीसरे भाग के बराबर मोटी ईंटों का निर्माण करना चाहिये। इनकी मोटाई एक छोर से दूसरे छोर तक बराबर होती है। ईंटों को पूर्ण रूप से सुखाकर पुनः इन्हें समान रूप से पकाया जाता है॥११८-११९॥ एकद्वित्रिचतुर्मासमतीत्यैव विचक्षणः। जले प्रक्षिप्य यत्नेन जलादुद्धृत्य तत्पुनः। निरार्द्रास्ताः प्रयोक्तव्या इष्टका इष्टकर्मणि ॥१२०॥ इसके पश्चात् एक, दो, तीन या चार मास बीत जाने पर बुद्धिमान ( स्थपति ) को ईंटों को यत्नपूर्वक जल में डाल कर पुनः जल से निकालना चाहिये। जब ईंटें सूख जायें तब इच्छित निर्माणकार्य में इनका प्रयोग करना चाहिये॥१२०॥ एवं द्रुमेष्टकशिला विधिना गृहीत्वा कुर्वन्तु वस्तु विहिता हि वराः समृद्धयै। यन्निन्दितं त्वपरवस्तववशिष्टमाद्यै- र्द्रव्यं विनष्टभवनप्रभवं विपत्त्यै ॥१२१॥ इस प्रकार विधिपूर्वक वृक्ष ( काष्ठ ), ईंट एवं शिला आदि लेकर भवननिर्माण करना चाहिये। श्रेष्ठ जन ऐसे भवन को समृद्धिकारक कहते हैं। जो पदार्थ निन्दित हैं अथवा दूसरे भवन से लिये गये हैं ( पुराने भवन से निकले ईंट, काष्ठ आदि ), उनसे निर्मित भवन नष्ट हो जाते हैं तथा ( गृहस्वामी के लिये ) विपत्ति के कारण बनते हैं, ऐसा प्राचीन जनों का मत है॥१२१॥ स्तम्भायामं तारमाकारभेदं सालङ्कारं भूषणं च क्रमेण। युक्त्या युक्तं सम्पदामास्पदं तत् प्रोक्तं नृणां तैतिलानां मयेह ॥१२२॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहो नाम पञ्चदशोऽध्यायः

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