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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१५८ मयमतम् स्तम्भों की लम्बाई, मोटाई एवं आकारों का वर्णन उनके अलङ्कार एवं सज्जा- सहित क्रमानुसार किया गया है। मनुष्यों एवं देवों के गृह में विधिपूर्वक इनका प्रयोग सम्पत्ति प्रदान करता है, ऐसा मय द्वारा वर्णित है।।१२२।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. स्तम्भ के मान एवं भेद ( श्लोक १-२८ ) (क) समराङ्गणसूत्रधार (२८.२७-३३) में पद्मकस्तम्भ, घटपल्लवक स्तम्भ, कुबेर एवं श्रीधर संज्ञक चार स्तम्भों का उल्लेख किया गया है। विभिन्न प्रकार के अलङ्करणों से युक्त पद्मकस्तम्भ, अष्टकोण घटिका, पुष्पमाला एवं पल्लव आदि से अलंकृत घटपल्लवक स्तम्भ, षोडश कोण से युक्त कुबेरस्तम्भ तथा ऊपर पल्लवों से युक्त चौकोर श्रीधर संज्ञक स्तम्भ होते हैं— एवं गृहाणां चत्वारः स्तम्भा लक्ष्मभिरीरिताः। (२८.३३) (ख) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६४ अ. ) में स्तम्भों को सभी निर्माण का आधार कहा गया है। इसका निर्माण सुकरता, सुख एवं शोभा के लिये किया जाता है। इसका निर्माण प्रस्तर, धातु, काष्ठ अथवा इष्टकाओं द्वारा किया जाता है— निर्माणस्य यथा भूमिराधारस्सम्प्रकीर्तितः। तथा तस्याधारमाहुः पादं शिल्पविशारदाः ।।१।। सौकर्यञ्च सुखं शोभालाभः पादप्रकल्पनात्। तस्मात्तत्कल्पयेच्छिल्पी शिलालोहद्रुमेष्टकैः ।।२।। इस ग्रन्थ में बारह प्रकार के स्तम्भों का वर्णन किया गया है। ये हैं—देवकान्त, ब्रह्मकान्त, इन्द्रकान्त, विष्णुकान्त, स्कन्दकान्त, सोमकान्त, सुप्रतीकान्त, सूर्यकान्त, ब्राह्मणकान्त, कैलासकान्त, मेरुकान्त एवं नन्दिकान्त स्तम्भ। आकृति एवं लक्षण- सहित इनका वर्णन इस प्रकार है— देवकान्तं ब्रह्मकान्तमिन्द्रकान्तमथापि वा।।३।। विष्णुकान्तं स्कन्दकान्तं सोमकान्तमिति क्रमात्। वर्तुलं चतुरस्रञ्च षडस्रन्त्वष्टपट्टिकम् ।।४।। द्वादशास्रं षोडशास्रं पादकल्पं विदुर्बुधाः। पुरः पश्चात्सर्वतो वा कल्पस्तम्भप्रकल्पनम्।।५।। युग्मद्वियुग्मसङ्कीर्णोपस्तम्भादिप्रकल्पनम् । सुप्रतीकान्तकं सूर्यकान्तं ब्राह्मणकान्तकम्।।६।।