मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५९ कैलासमेरुकं कान्तं तथा नन्दीशकान्तकम्। इति द्वादशभेदेन स्तम्भानां कल्पनं मतम्।।७।। इनके प्रमाण एवं अलङ्करण का भी वर्णन प्राप्त होता है (८-३४ श्लोक)। इन पर गज, वाजन, चक्रवाक, हंस, शुक, सारिका, विभिन्न देवता, लता, पुष्प आदि का अङ्कन करना चाहिये। इनके लिये उपयुक्त काष्ठ तिलक, शाल, श्रीपर्ण, चन्दन, शमी आदि सारवान एवं दोषरहित वृक्षों से ग्रहण करने चाहिये। (ग) राजवल्लभमण्डन (अ. ५) में स्तम्भ के विषय में इस प्रकार वर्णन प्राप्त होता है— स्तम्भोऽष्टास्रसुवृत्तभद्रसहितो रूपेण चालङ्कृतो युक्तः पल्लवकैस्तथाभरणकं स्यात्पल्लवेनावृतम्। कुम्भी भद्रयुता कुमारसहितं शीर्ष तथा किन्नराः पत्रं चेति गृहे न शोभनमिदं प्रासादके शस्यते।। (५.३३) स्तम्भ अष्टकोणीय, वृत्ताकार, भद्रयुक्त, विविध रूपों से सुसज्जित, पल्लव, आभरण, कुम्भी, भद्र, कुमार एवं शीर्ष पर किन्नर से युक्त होना चाहिये। इस प्रकार का स्तम्भ देवालय में प्रशस्त होता है। (घ) मनुष्यालयचन्द्रिका (५ अ. २१-२५) में दृढ़ अधिष्ठान के लिये ओमा, घट, मण्डि अथवा घटफलक, वीरकाण्ड एवं पोतिका संज्ञक अवयवों का निर्माण किया जाता है। इन स्तम्भों का मध्य भाग गृहकर्त्ता को रुचि के अनुसार चौकोर, गोल, अष्ट अथवा षोडश कोण बनाना चाहिये। स्तम्भ की स्थापना के लिये स्तम्भ के मूल में स्थित ओमा में गर्त बनाना चाहिये। स्तम्भ में मूलाग्र (लकड़ी की चूल) निर्मित कर उसे ओमा में स्थापित किया जाता है— स्तम्भाः स्वविस्तारहुताशभागप्रक्लृप्तमूलाग्रशिखासमेताः। स्थाप्या यथार्हं निजपीठकोर्ध्वं तद्गर्तसंलग्नशिखाः समस्ताः।।२३।। (ङ) शिल्परत्न (पूर्वभाग २१ अ.) में स्तम्भों के माप, अङ्ग, आकृति एवं अलङ्करण आदि का.विस्तार से वर्णन किया गया है। इनमें चौकोर स्तम्भ ब्रह्मकान्त, अष्टकोण विष्णुकान्त (५८ श्लोक), षट्कोण इन्द्रकान्त या स्कन्दकान्त, द्वादश कोण भानुकान्त, षोडश कोण चन्द्रकान्त (५९), वर्तुलाकार ईशकान्त, मूल में चौकोर एवं मध्य में अष्टकोण रुद्रकान्त स्तम्भ (६०-६१) होते हैं। अलङ्करणों के अनुसार भद्रकान्त, वज्रकान्त आदि स्तम्भों के भेद वर्णित हैं। स्तम्भों का सामान्य वर्णन इस प्रकार किया गया है— कार्याः स्युश्चरणा युगाष्टनृपकोणाः सर्वतो वर्तुला विस्तारत्रिगुणोपरित्रिगुणविस्तारोन्मिताष्टास्रकाः ।