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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १६१ ( श्लोक ३२-३४ ) कलश के विषय में मयमत के साथ अन्य ग्रन्थों में प्राप्त वर्णन की तुलना इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है—

मयमतअजिता<br>(१४.३४-३६)दीप्तागम<br>(५.२३-२४)ईशानशिव-<br>गुरुदेवपद्धति<br>(क्रिया.३१.५१-५३)शिल्परत्न<br>(२१.७९-८०)
दृग् १।९दृग् १।९धृग् १।९धृग् १।९धृग् १।९
कमल ४।९कुम्भ ४।९कलश ४।९कुम्भ ४।९घट ४।९
कण्ठ १।९कण्ठ १।९कण्ठ १।९कण्ठ १।९कर्ण १।९
आस्य १।९आस्य १।९आस्य १।९मुख १।९मुख १।९
पद्म १।९पद्म १।९पद्म १।९पद्म १।९पद्म १।९
वृत्त १।१८वृत्त-वृत्त-वृत्त १।१८पीठिका १।९
हीरकौ १।१८ग्रीव १।९भित्रौ १।९भिन्नकौ १।१८
( मयमत में ब्रूनो डेगेन्स की टिप्पणी २०, पृष्ठ १८९ )
३. पोतिका ( श्लोक ३९-५० )
स्तम्भ के शीर्षभाग पर वीरकाण्ड के ऊपर स्थापित होता है। इसके विषय में
अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार प्राप्त होता है—
(क) मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में इसे रूपोत्तर को सहारा देने वाला अङ्ग
कहा गया है। इसका माप इस प्रकार वर्णित है—
स्तम्भाग्रोत्तरतारयोगदलविस्तारं तथा स्तम्भम-
ध्योद्यद्व्यासतातं च तद्गलघनां रूपोत्तरे पोतिकाम्।। (२९)
पत्रोत्तरे चेद् वितताङ्घ्रिहीनतीव्रा विधेया खलु पोतिकेयम्।
खण्डोत्तरे तुल्यवितानतीव्रा सर्वांश्च सर्वेषु यथोपशोभम्।। (३०)
(ख)
..................................................वीरकाण्डं त्रिसाधें-
षूद्वन्वद्दण्डदीर्घं चरणतततदर्थोच्छ्रायं पोतिकां च।।
( तन्त्रसमुच्चय-२.२५ )
(ग) वास्तुविद्या ( ८ अ. ) में त्रिदण्डा, चतुर्दण्डा एवं पञ्चदण्डा तथा पत्री, चित्री
एवं महार्णवी संज्ञक तीन प्रकार की पोतिकाओं का वर्णन प्राप्त होता है—
पोतिका तु त्रिधा ज्ञेया नामभेदेन दैर्घ्यतः।
त्रिदण्डा च चतुर्दण्डा पञ्चदण्डा यथाक्रमम्।।
महार्णवी च चित्री च पत्री च प्रतिलोमतः। (८.४४, ४५)
मय०-११