मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षोडशोऽध्यायः ( प्रस्तरकरणम् ) उत्तरादिवृतेरन्तं प्रस्तारावयवं क्रमात् । संवक्ष्ये शिष्य सर्वेषां हर्म्याणामथ योग्यकम् ॥१॥ प्रस्तर-निर्माण—मैं ( मय ऋषि ) सभी प्रकार के भवनों के अनुरूप उत्तर से प्रारम्भ कर वृति ( प्रति ) पर्यन्त प्रस्तार ( प्रस्तर ) के अंगों का सम्यक् रूप से क्रमशः वर्णन कर रहा हूँ।।१।। ✳ उत्तरवाजनौ ✳ उत्तरं त्रिविधं पादविस्तारं तत्समोद्गमम् । त्रिपादोदयमध्योच्चं विस्तारं पादतः समम् ॥२॥ उत्तर एवं वाजन—उत्तर ( स्तम्भ के ऊपर की भित्ति ) तीन प्रकार का होता है। प्रथम की चौड़ाई स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये एवं उसकी ऊँचाई चौड़ाई के बराबर होनी चाहिये। दूसरे उत्तर की ऊँचाई चौड़ाई से तीन चौथाई अधिक होनी चाहिये एवं तीसरे उत्तर की ऊँचाई चौड़ाई की आधी होनी चाहिये।।२।। खण्डोत्तरं पत्रबन्धं रूपोत्तरमिति त्रिधा। त्रिपादं वा त्रिभागोनमर्धं वा कर्णनिर्गमम् ॥३॥ इन तीनों उत्तरों की संज्ञा खण्डोत्तर, पत्रबन्ध एवं रूपोत्तर है। इनका कर्णनिर्गम ( कोणों पर निकली निर्मिति ) तीन चौथाई, तीन भाग कम अथवा आधा होना चाहिये। स्वस्तिकं वर्धमानं च नन्द्यावर्तसमाकृतिः । सर्वतोभद्रवृत्तिर्वा प्रत्युत्तरनिवेशनम् ॥४॥ उत्तर से वृति ( अथवा प्रति ) के मध्य होने वाले निवेश स्वस्तिक, वर्धमान, नन्द्यावर्त अथवा सर्वतोभद्र आकृति के होते हैं।।४।। त्रिभागैकं चतुर्भागं वाजनं निर्गमोद्गमम् । चतुरस्रं सपर्णाग्रं तदूर्ध्वं मुष्टिबन्धनम् ॥५॥ वाजन के तीसरे अथवा चौथे भाग से चार कोणों वाले एवं ऊपरी भाग में पर्ण