भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१६६ मयमतम् से युक्त निर्गम का प्रारम्भ होना चाहिये। निर्गम के ऊपर मुष्टिबन्ध निर्मित होना चाहिये। तुलाच्छेदेन वा कुर्यात् पृथग्वा वाजनोपरि । स्तम्भार्धविपुलं स्वार्धं तीव्रं पट्टाम्बुजक्रियम् ॥६॥ सनालिकमधस्तात्तु वाजनाद् दण्डनिर्गमम् । वाजन के ऊपर मुष्टिबन्ध तुलाच्छेद के द्वारा अथवा स्वतन्त्र रूप से निर्मित होना चाहिये। स्तम्भ की चौड़ाई का आधा चौड़ा एवं अपनी चौड़ाई का आधा मोटा अम्बुज- पट्ट निर्मित होना चाहिये। वाजन के नीचे नाली से युक्त दण्डनिर्गम का निर्माण होना चाहिये॥६॥ ✵ प्रमालिका ✵ मूलाग्रयोः शिखोपेता तदूर्ध्वं तु प्रमालिका ॥७॥ स्तम्भव्याससमोच्चा वा त्रिचतुर्भागतीव्रका । कुम्भमण्डियुताग्रा च हस्तिमुण्डकसन्निभा ॥८॥ उसके ऊपर मूल एवं ऊर्ध्व भाग में शिखा से ( चूल ) युक्त प्रमालिका निर्मित होती है। यह स्तम्भ के व्यास के बराबर ऊँची एवं उसके तीसरे या चौथे भाग के बराबर मोटी होती है। साथ ही हाथी के सूँड़ के समान आकृति वाली कुम्भ एवं मण्डि से युक्त होती है॥७-८॥ ✵ दण्डिका ✵ दण्डिकासमनिष्क्रान्ता तदूर्ध्वं दण्डिका भवेत् । स्तम्भार्धविपुला स्वार्धतीव्रा नीव्राधर्धनिष्क्रमा ॥९॥ मुष्टिबन्धसमाकारचतुरस्रा यथा तथा । इसके ऊपर दण्डिका होती है। यह स्तम्भ की आधी चौड़ी, चौड़ाई की आधी मोटी एवं एक दण्ड माप की होती है। इसका निष्क्रम नीव्र का आधा होता है। इसकी आकृति मुष्टिबन्ध के समान चौकोर होती है॥९॥ ✵ वलयं गोपानञ्च ✵ यथेष्टविपुलोत्तुङ्गं तत्तुङ्गसमवेशनम् ॥१०॥ वलयं स्यात्तदूर्ध्वं तु गोपानं वा तदूर्ध्वतः । मुष्टिबन्धविशालोच्चा पट्टिकाक्षेपणाम्बुजा ॥११॥ इसके ऊपर ऊँचाई पर इच्छानुसार चौड़ा एवं ऊँचा वलय होना चाहिये। उसके ऊपर गोपान तथा उसके ऊपर क्षेपणाम्बुज पट्टिका होती है, जो मुष्टिबन्ध के समान विस्तृत एवं ऊँची होती है॥१०-११॥