भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 395 में से

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पृष्ठ 197

षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १७३ ✵ लेपः ✵ मधुघृतदधिदुग्धं माषयूषं च चर्म कदलिफलगुलञ्च त्रैफलं नालिकेरम्। क्रमवशमनुभागैर्वर्धितं लब्धचूर्णं शतमथ कृतमस्य द्वैगुणं शर्करास्तु ॥४९॥ लेप-सामग्री—लेप के लिये यह मिश्रण तैयार किया जाता है—शहद, घृत, दही, दूध, उड़द का पानी, चमड़ा, केला, गुड़, त्रिफला एवं नारियल। इन्हें क्रमशः एक-एक भाग बढ़ाते हुये लेना चाहिये। इनमें एक सौ भाग चूना मिलाना चाहिये तथा इस मिश्रण में दुगुनी मात्रा में बालू मिलाना चाहिये॥४९॥ ✵ युग्मायुग्ममानम् ✵ हस्तस्तम्भतुलादिकान् नरगृहे युञ्ज्यादयुग्मं यथा युग्मायुग्मकसंख्यया सुरगृहे युञ्जीत हस्तादिकान्। सम एवं विषम मान—मनुष्यों के गृह में हस्त, स्तम्भ तथा तुला आदि का प्रयोग विषम संख्याओं में करना चाहिये; किन्तु देवालय में हस्त आदि का प्रयोग सम अथवा विषम संख्याओं में होता है। ✵ द्वारम् ✵ मध्ये द्वारमनिन्दितं सुरमहिदेवक्षितीशालये शेषाणामुपमध्यमेव विहितं तत्सम्पदामास्पदम् ॥५०॥ देवता, ब्राह्मण एवं राजाओं के गृह में मध्य में द्वारस्थापन निन्दनीय नहीं है; किन्तु अन्य वर्ण वालों के लिये द्वार मध्य के पार्श्व में शुभ होता है॥५०॥ ✵ वेदिः ✵ प्रतेरुपरि वेदिः स्यात् सार्धद्वित्र्यङ्घ्रिणोदयम् ॥५१॥ प्रति के ऊपर वेदि का निर्माण होना चाहिये, जिसकी ऊँचाई प्रति की डेढ़, पौने दो या दुगुनी होनी चाहिये॥५१॥ द्वौ षट् चत्वारि कम्पानि पादपादघनानि च। पद्मशैवलपत्रादिचित्राङ्गा वेदिका मताः ॥५२॥ कम्प की संख्या दो, चार या छः होनी चाहिये। इनकी मोटाई चौथाई दण्ड होनी चाहिये। इनकी वेदिका पद्मपुष्प, शैवाल एवं पत्र आदि चित्रों से सज्जित होनी चाहिये॥५२॥

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