मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ मयमतम् तुला (की स्थापना) द्वार के अनुसार होनी चाहिये। जयन्ती (उसके ऊपर) तिरछी रक्खी जानी चाहिये। उसके ऊपर द्वार के अनुसार अनुमार्ग रक्खा जाना चाहिये। द्वारतिर्यग्गता वाऽथ तुला देवनृपवेशयोः । त्रिदण्डं वा द्विदण्डं वा स्याद्वलीकतुलान्तरम् ॥४४॥ देवालय एवं राजभवन में तुला द्वार से तिरछी होनी चाहिये। वलीक एवं तुला के मध्य का अवकाश दो या तीन दण्ड होना चाहिये॥४४॥ द्विदण्डं सार्धमध्यर्धं जयन्त्यन्तरमिष्यते । दण्डान्तरमनु मार्गं निश्छिद्रं स्यात्तदूर्ध्वतः ॥४५॥ जयन्तियों के मध्य का अन्तर डेढ़ या ढाई दण्ड होता है। उनके ऊपर एक-एक दण्ड के अन्तर पर रक्खे अनुमार्ग उनके मध्य के छिद्र को भर देते हैं॥४५॥ अथ चित्रविचित्राङ्गा विधेया प्रस्तरक्रिया । क्षुद्राणां तु तुलादीनि यथा स्थैर्यं तथाचरेत् ॥४६॥ इस प्रकार प्रस्तर-क्रिया चित्र-विचित्र अङ्गों से निर्मित होती है। क्षुद्र एवं तुला को इस प्रकार रखना चाहिये, जिससे कि वे दृढ़तापूर्वक स्थापित हो जायँ॥४६॥ विरूपं वा सरूपं वा सर्वमङ्गं प्रयोजयेत् । तुलाद्वयोपरिष्टात्तु फलकाच्छादनं तु वा ॥४७॥ इष्टका वा विधातव्या शेषं पूर्ववदाचरेत् । रूप (आकृति) के साथ अथवा बिना रूप के (प्रस्तर-प्रकल्पन में) सभी अङ्गों का प्रयोग करना चाहिये। तुला के ऊपर फलकों द्वारा आच्छादन करना चाहिये। अथवा ईंटों से आच्छादन करना चाहिये। शेष कार्य पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये॥४७॥ ✺ प्रस्तरमानम् ✺ पङ्क्त्यष्टभागविकलं हि मसूरकोच्छा- न्म्रोन्नतं मतमथो तलिषार्धकं वा । यावद् बलं विपुलसुन्दरतां समेति तावद् विधेयमधुना विधिना विधिज्ञैः ॥४८॥ प्रस्तर की ऊँचाई मसूर की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये एवं स्तम्भ की ऊँचाई से दश या आठ भाग कम होनी चाहिये। प्रस्तर की ऊँचाई एवं माप इस प्रकार रखना चाहिये, जिससे कि भवन को दृढ़ता एवं सौन्दर्य प्रदान किया जा सके, ऐसा विद्वानों का मत है॥४८॥