मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १७१ त्रिचतुष्पञ्चदण्डेन दीर्घं तत्साग्रनालिकम् । सव्यालाग्रं सम्भृताग्रं पार्श्वाङ्गैस्तत्तरङ्गवत् ॥३७॥ वलीक की लम्बाई तीन, चार या पाँच दण्ड होनी चाहिये। इसके अग्र भाग में नालियाँ, व्याल या बिन्दु होना चाहिये एवं इसका पार्श्व भाग तरङ्ग की भाँति होना चाहिये।।३७।। वलीकं स्याद्वलीकोर्ध्वं कर्तव्या वर्णपट्टिका । दण्डार्धार्धविशालोच्चा निश्छिद्रं स्यात्तदन्तरे ॥३८॥ फलकैश्च तदूर्ध्वे तु दण्डोत्सेधा तुला स्थिरा । त्रिपादविस्तृता न्यस्ता प्रवेशानुगता शुभा ॥३९॥ ( उपर्युक्त वर्णन के अनुसार ) वलीक होना चाहिये। वलीक के ऊपर वर्णपट्टिका का निर्माण करना चाहिये। इसका विस्तार आधा दण्ड एवं ऊँचाई विस्तार का आधा होना चाहिये। उसके मध्य भाग को फलकों द्वारा छेदरहित करना चाहिये। इसके ऊपर एक दण्ड ऊँची स्थिर तुला स्थापित करनी चाहिये। तुला का विस्तार तीन चौथाई दण्ड होना चाहिये। इसे द्वार की ओर उन्मुख होना चाहिये।।३८-३९।। तुलाविस्तारतारोच्चा जयन्ती स्यात्तुलोपरि । अर्धदण्डेन तत्रोच्चा जयन्त्यूर्ध्वेऽनुमार्गकम् ॥४०॥ तुला के ऊपर तुला की चौड़ाई के बराबर ऊँचाई वाली जयन्ती रक्खी जानी चाहिये। जयन्ती के ऊपर आधा दण्ड ऊँचा अनुमार्गक रखना चाहिये।।४०।। तदूर्ध्वे फलका पादपादषड्भागतीव्रकाः । इष्टकाचूर्णसङ्घातप्रस्तरस्तम्भविस्तरम् ॥४१॥ उसके ऊपर फलकों को स्थापित करना चाहिये। इसकी मोटाई दण्ड के चौथे या छठवें भाग के बराबर होनी चाहिये। प्रस्तर एवं स्तम्भ के विस्तार को ईंटों एवं चूर्ण से जोड़ना चाहिये।।४१।। करालमुद्गिगुल्मासकल्कचिक्कणकर्मवान् । उत्तरं वाजनं चैव तत्पार्श्वानुगतं भवेत् ॥४२॥ कराल, मुद्गि, गुल्मास, कल्क एवं चिक्कण ( ये सभी ईंटों को जोड़ने एवं लेप में प्रयुक्त होते हैं ) का प्रयोग करना चाहिये। उत्तर एवं वाजन पार्श्व में लगने चाहिये। तुला द्वारानुयाता हि जयन्ती तिर्यगागता । अनुमार्गं तदूर्ध्वे तु द्वारस्यानुगतं शुभम् ॥४३॥