मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० मयमतम् प्रतिवक्त्र संज्ञक भाग का माप प्रति के माप का तीन चौथाई, आधा, एक दण्ड, सवा दण्ड अथवा डेढ़ दण्ड रखना चाहिये ।।३०।। तावदूर्ध्वोद्गतितस्तस्याः प्रागुक्तविधिना कुरु। सव्याला वा ससिंहेभा ऋज्वी वा स्यात्प्रतेः कृतिः ॥३१॥ उसके ऊपर उसकी गति का निर्माण पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। प्रति की रचना व्याल के सहित, सिंह के सहित, गज के सहित अथवा सीधी करनी चाहिये। तदुच्चत्रिचतुर्भागं वाजनं निर्गमोद्गमम्। समकरं चित्रखण्डं नागवक्त्रमिति त्रिधा ॥३२॥ इसके ऊपर इसकी ऊँचाई के तीसरे अथवा चौथे भाग से वाजन एवं निर्गम का प्रारम्भ करना चाहिये। ये समकर, चित्रखण्ड एवं नागवक्त्र—तीन प्रकार के होते हैं। नागवक्त्रं नागफणं स्वस्त्याकृतिशिरःक्रियम् । तैतिलानां द्विजातीनां भवेत् समकरा प्रतिः ॥३३॥ नागवक्त्र आकृति में नाग के फण एवं स्वस्ति की आकृति में (नाग का) सिर निर्मित होता है। देवों एवं ब्राह्मणों के भवन में समकर प्रति का निर्माण करना चाहिये। चतुरस्रं तु खण्डाग्रं मकरं चित्रखण्डकम्। नृपाणां वणिजां शूद्रजन्मनामर्धचन्द्रकम् ॥३४॥ हस्तिरूपं भवेन्मुण्डं प्रत्यग्रं चित्रसन्निभम्। ककरं कर्कटं बन्धमन्यदप्येवमूह्यताम् ॥३५॥ (समकर प्रति) आकृति में चौकोर एवं शीर्षभाग में मकर निर्मित होता है। चित्रखण्ड प्रति राजाओं, व्यापारियों (वैश्यों) एवं शूद्रों के (भवन के) अनुकूल होता है। इसकी आकृति अर्धचन्द्र के सदृश होती है। इसका शीर्षभाग गज की आकृति से युक्त होता है। इस प्रति का अग्र भाग चित्र की भाँति होता है; इसलिये इसे ककर, कर्कट, बन्ध अथवा अन्य संज्ञा से भी सम्बोधित करते हैं।।३४-३५।। ✹ तुलादिबन्धम् ✹ वाजनोध्र्वे वलीकोर्ध्वं तुलां सम्यङ् निवेशयेत् । दण्डोच्चं वा त्रिपादोच्चमर्धतारसमन्वितम् ॥३६॥ वाजन के ऊपर (अथवा) वलीक के ऊपर भली-भाँति तुला (बीम) को स्थापित करना चाहिये। इसकी ऊँचाई एक दण्ड अथवा तीन चौथाई दण्ड होनी चाहिये तथा इसकी मोटाई ऊँचाई की आधी होनी चाहिये।।३६।।