भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १६९ जिस वस्तु के प्रयोग से स्थिरता प्राप्त हो, उसी का प्रयोग बुद्धिमान ( स्थपति ) को करना चाहिये। कपोत की ऊँचाई के तीन भाग अथवा चतुर्थांश के बराबर क्षुद्रनिष्कृति ( बाहर निकला भाग ) बनाना चाहिये।।२४।। कपोते नासिका क्षुद्रे नीव्रोर्ध्वं स्थितकर्णिका। सपाददण्डा वाध्यर्धं द्विदण्डं विस्तृता स्थिता ॥२५॥ कपोत के नीव के ऊपर नासिका ( खिड़की के सदृश आकृति ) होती है, जो कर्णिका ( लता ) की भाँति होती है। यह सवा दण्ड, डेढ़ दण्ड या दो दण्ड विस्तृत होती है।।२५।। सिंहश्रोत्रशिखालिङ्गं पट्टिकान्तस्य पट्टिका। विधेया स्वस्तिकाकृत्या नासिकोर्ध्वं तु नासिका ॥२६॥ कुक्षिमानं शिखामानं यथाशोभनमेव वा। प्रतिवाजनकस्योर्ध्वं नेष्यते नासिकोच्छ्रयम् ॥२७॥ इसके शीर्ष भाग की आकृति सिंह के कान के सदृश होती है। पट्टिका के अन्तिम भाग में स्वस्तिक की आकृति वाली पट्टिका होती है। नासिका के ऊपर नासिका निर्मित होनी चाहिये। इसके मूल भाग एवं ऊर्ध्व भाग का प्रमाण शोभा के अनुसार होना चाहिये। प्रतिवाजनक के ऊपर नासिका की ऊँचाई नहीं होनी चाहिये।।२६-२७।। ✺ प्रस्तरोर्ध्वभागम् ✺ आलिङ्गं पादपादोच्चं पादात् पादविनिर्गतम्। तस्मादन्तरितं चोर्ध्वं निष्क्रान्तावेशनक्रियम् ॥२८॥ प्रस्तर का ऊपरी भाग—प्रस्तर के ऊर्ध्व भाग की योजना इस प्रकार है— आलिङ्ग का माप पाद के चतुर्थांश माप का होता है एवं पादविनिर्गत ( बाहर निकला भाग ) भी चतुर्थांश माप का होना चाहिये। उन दोनों के मध्य में ऊर्ध्व भाग पर निष्क्रान्त स्थापित करना चाहिये।।२८।। त्रिपट्टाग्रं हि पादोच्चं पादे पादान्तरे स्थितम्। दण्डं त्रिपादमर्धं वा प्रत्युत्सेधं तदूर्ध्वतः ॥२९॥ दो स्तम्भों के मध्य, स्तम्भों के ऊपर स्तम्भ की ऊँचाई का त्रिपट्टाग्र ( तीन पट्टियों की आकृति ) निर्मित होनी चाहिये। उसके ऊपर प्रति का निर्माण करना चाहिये, जिसका माप एक दण्ड, तीन चौथाई अथवा आधा दण्ड होना चाहिये।।२९।। स्वोच्चत्रिपादनिष्क्रान्ता प्रतिरर्धेन वा तथा। दण्डः सपादः सार्धो वा प्रतिवक्त्रं विनिर्गमः ॥३०॥