भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१६८ मयमतम् स्तम्भों के मध्य भाग को सार वृक्ष के काष्ठ के फलकों ( पटरों ) से छा देना चाहिये। इसे दण्ड के आठवें भाग की मोटाई वाले फलकों से छाना चाहिये। इसके ऊपर गोपान के ऊपर धातुनिर्मित लोष्टकों ( टाइल्स ) से आच्छादन करना चाहिये। इसके साथ दो या तीन दण्ड माप की ऊँचाई पर निकली हुई कपोतपालिका निर्मित होनी चाहिये।।१७-१८।। एकहस्तं द्विहस्तं वा क्षुद्रे महति मन्दिरे। यथाशोभं यथाचित्रं कपोते कर्णपालिका ॥१९॥ तथा मध्यस्थिता वाऽपि सौधे शैले समाहिता। छोटे भवन में एक हाथ की एवं बड़े भवन में दो हाथ की सुन्दरता के लिये चित्रयुक्त कर्णपालिका कपोत पर निर्मित करनी चाहिये। अथवा इसे भवन के मध्य भाग में प्रस्तर-निर्मित कर्णपालिका लगानी चाहिये।।१९।। ✺ वाजनम् ✺ विधेया वाजनस्योर्ध्वं भूतहंसादिकावलिः ॥२०॥ दण्डोच्चा वा त्रिपादोच्चा वाजनं पूर्ववद्भवेत्। कपोतालम्बनं तत्स्याद्दण्डार्धं वाऽथ दण्डकम् ॥२१॥ वाजन के ऊपर भूत ( प्राणी, पशु आदि ) एवं हंस आदि की पंक्ति एक दण्ड या पौन दण्ड ऊँची होनी चाहिये। वाजन पूर्व के सदृश होना चाहिये। वहाँ आधे दण्ड या एक दण्ड माप का कपोतालम्बन होना चाहिये।।२०-२१।। अध्यर्धादित्रिदण्डान्तं कपोतोच्चविनिर्गतम् । वसन्तकं वा निद्रा वा विधेया वाजनोपरि ॥२२॥ त्रिपादोच्चा तदूर्ध्वं स्यात्कपोतोच्चं तु पूर्ववत् । कपोत की ऊँचाई से निकला निर्गम डेढ़ दण्ड से लेकर तीन दण्डपर्यन्त होता है। वाजन के ऊपर वसन्तक अथवा निद्रा निर्मित करनी चाहिये। यह उसके ऊपर पौन दण्ड ऊँची होनी चाहिये एवं कपोत की ऊँचाई पूर्ववर्णित रखनी चाहिये।।२२।। ✺ कपोतम् ✺ एवं स्याद् दृढकल्प्यं तच्छिलयेष्टकमात्रकैः ॥२३॥ यथाप्रयोगं स्थैर्यं तु तथा योज्यं विचक्षणैः । कपोतोच्चत्रिभागं वा पादं वा क्षुद्रनिष्कृतिः ॥२४॥ इस प्रकार पूर्वोक्त वर्णित भागों को प्रस्तर अथवा ईंटों से दृढ़ बनाना चाहिये।