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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८७ कुम्भ एवं मण्डि आदि से युक्त स्तम्भ की सन्धि ( उपर्युक्त दोनों की सन्धि ) सम्पत्ति-कारक होती है। सज्जा से युक्त प्रस्तर-स्तम्भ की सन्धि जैसी आवश्यकता हो, उसके अनुसार करनी चाहिये ।। ३६ ।। स्थितस्य पादपस्याङ्गप्रवृत्तिवशतो विदुः । ऊर्ध्वमूलमधश्चाग्रं सर्वसम्पद्विनाशनम् ।। ३७ ।। खड़े वृक्ष के ( काष्ठों के ) विविध अङ्गों का संयोग अनुकूलता के अनुसार करना चाहिये। ऊर्ध्व भाग का मूल भाग के साथ एवं निचले भाग के साथ शीर्ष भाग की सन्धि सभी प्रकार की सम्पत्तियों का नाश करती है ।। ३७ ।। ✺ शयितसन्धयः ✺ अर्धपाणिद्विल्ललाटे लाङ्गलाकारषट्शिखा । घनमध्यस्थकीला या सा मता षट्शिखाह्वया ।। ३८ ।। क्षैतिज सन्धियाँ—जिसके दोनों छोरों पर अर्धपाणि सन्धियाँ हों एवं सन्धि वाले पदार्थ में छः लाङ्गल ( हल के ) आकार की शिखायें ( चूलें ) बनी हों, साथ ही मध्य की कील मोटी हो, उस सन्धि को षट्शिखा सन्धि कहते हैं ।। ३८ ।। स्वायामतिर्यग्बाहुस्थशिखं तु झषदन्तकम् । ऊर्ध्वाधस्ताद् यथायोग्यं यथाबलशिखान्वितम् ।। ३९ ।। झषदन्तक सन्धि में पदार्थ के ऊपर एवं नीचे दोनों ओर बहुत-सी शिखायें होती हैं। ये सभी शिखायें आवश्यकतानुसार एवं बल के अनुसार निर्मित होती हैं ।। ३९ ।। सूकरघ्राणमित्युक्तं सूकरघ्राणसन्निभम् । यथाबलं यथायुक्ति नानाबलशिखान्वितम् ।। ४० ।। सूअर की नाक के समान, आवश्यकतानुसार शक्ति एवं योग से युक्त, विभिन्न बल की शिखाओं वाली सन्धि सूकरघ्राण कही जाती है ।। ४० ।। नानाकीलैस्तु सङ्कीर्णं स्यात्तु सङ्कीर्णकीलकम् । वज्राकृतिशिखं नाम्ना वज्रसन्निभमेव तत् ।। ४१ ।। विभिन्न प्रकार की कीलों से युक्त सन्धि को सङ्कीर्णकीलक कहते हैं। वज्रसन्निभ सन्धि में वज्र के आकृति की शिखा होती है ।। ४१ ।। एतस्मिन् पङ्क्तिसन्धाने सन्धिरेकाकृतिर्भवेत् । उपर्युपरि चैवं स्याद् विपरीते विपत्करम् ।। ४२ ।। इस प्रकार एक पंक्ति को जोड़ने में ऊपर से नीचे तक एक ही आकार की सन्धि