भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१८६ मयमतम् पाँच प्रकार की सन्धियाँ इस प्रकार हैं—षट्शिखा, झषदन्त, सूकरघ्राण, सङ्कीर्णकील एवं वज्राभ ।। ३० ।। ✺ स्तम्भसन्धयः ✺ स्वव्यासकर्णमध्यर्धद्विगुणं वा तदायतम् । त्र्यंशैकं मध्यमशिखं मेषयुद्धं प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥ स्तम्भ की सन्धियाँ—जब सन्धि वाले पदार्थ का मध्य भाग चौड़ाई में स्तम्भ के तीसरे भाग के बराबर एवं लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी अथवा ढाई गुनी हो तो इसे मेषयुद्ध सन्धि कहते हैं।।३१।। स्वस्त्याकारं त्रिखण्डं स्यात्सत्रिचूलि त्रिखण्डकम् । पार्श्वे चतुःशिखोपेतं सौभद्रमिति संज्ञितम् ॥३२॥ त्रिखण्ड सन्धि स्वस्तिक के आकार की होती है। इसके तीन भाग एवं तीन चूलियाँ होती हैं। पार्श्व में चार शिखा ( चूली ) से युक्त सन्धि सौभद्र कहलाती है।।३२।। अर्धं छित्त्वा तु मूलेऽग्रे चान्योन्याभिनिवेशनात् । अर्धपाणिरिति प्रोक्तो गृहीतघनमानतः ॥३३॥ जिस सन्धि के लिये स्तम्भ की मोटाई के अनुसार आधा भाग मूल ( निचले ) भाग का एवं आधा भाग अग्र ( ऊर्ध्व ) भाग का काटा जाता है, उसे अर्धपाणि सन्धि कहते हैं।।३३।। अर्धवृत्तशिखं मध्ये तन्महावृत्तमुच्यते । वृत्ताकृतिषु पादेषु प्रयुञ्जीत विचक्षणः ॥३४॥ जब चूलिका का आकार अर्धवृत्ताकार हो एवं मध्य भाग ( जहाँ जोड़ बैठाया जाय ) में अर्धवृत्त हो तो उस सन्धि को महावृत्त कहते हैं। बुद्धिमान ( स्थपति ) स्तम्भों के वृत्ताकार भाग में इस सन्धि का प्रयोग करते हैं।।३४।। स्तम्भानां स्तम्भदैर्घ्यार्धादधः सन्धानमाचरेत् । स्तम्भमध्योर्ध्वसन्धिश्चेद् विपदामास्पदं सदा ॥३५॥ स्तम्भों में की जाने वाली सन्धि स्तम्भों की लम्बाई के मध्य भाग के नीचे करनी चाहिये। स्तम्भ के मध्य एवं उसके ऊपर यदि सन्धि हो तो वह सर्वदा विपत्ति प्रदान करती है।।३५।। कुम्भमण्ड्यादिसंयुक्तं सन्धानं सम्पदां पदम् । सालङ्कारे शिलास्तम्भे यथा योगं तथाचरेत् ॥३६॥