मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८५ जब चारो ओर बहुत से पदार्थों का संयोग होता है एवं इसी प्रकार भीतर भी होता है तथा मध्य भाग में आँगन जैसी आकृति होती है तो बाह्य भाग से युक्त यह आकृति सभद्रक होती है।।२४।। पूर्वद्रव्यं परद्रव्यं भद्रकं दक्षिणोत्तरम् । शालानां भित्तिमाश्रित्य युक्त्या साधु समाचरेत् ॥२५॥ एवं युञ्ज्यादिदं बन्धं वर्धमानमितीरितम् । अधोभूमिक्रियायुक्त्या स्यादूर्ध्वोर्ध्वतलं प्रति ॥२६॥ पूर्व दिशा का पदार्थ दक्षिण की ओर एवं पश्चिम दिशा का पदार्थ उत्तर की ओर कक्षों की भित्ति का आश्रय लेते हुये उचित रीति से रखते हुये जोड़ना चाहिये। इस बन्ध को वर्धमान कहते हैं। निचले तल के कार्य के अनुसार ऊपर एवं उसके ऊपर के तल में भी करना चाहिये।।२५-२६।। विपरीतं विपत्त्यै स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः । दीर्घादीर्घेषु संयोगद्रव्यसन्धानतर्पणम् ॥२७॥ इसके विपरीत करने से विपत्ति आती है, ऐसा शास्त्रों का मत है। दीर्घ एवं अदीर्घ ( कम लम्बा ) का संयोग पदार्थों का विधिवत् परीक्षण एवं निरीक्षण करके ही करना चाहिये।।२७।। यथाबलं यथायोगं तथा योज्यं विचक्षणैः । एवं विधिविशिष्टं स्यात्सम्पत्त्यै द्रव्यबन्धनम् ॥२८॥ जिस स्थान पर जितने बल की एवं जिस प्रकार के योग ( सन्धि, जोड़ ) की आवश्यकता हो, वहाँ उसी प्रकार की सन्धि का प्रयोग बुद्धिमान ( स्थपति ) को करना चाहिये। इस प्रकार विशेष विधि से की गई सन्धि सम्पत्तिकारक होती है।।२८।। ✹ सन्धिभेदाः ✹ मेषयुद्धं त्रिखण्डं च सौभद्रं चार्धपाणिकम् । महावृत्तं च पञ्चैते स्तम्भानां सन्धयः स्मृताः ॥२९॥ सन्धि के भेद—स्तम्भों की पाँच प्रकार की सन्धियाँ इस प्रकार कही गई हैं— मेषयुद्ध, त्रिखण्ड, सौभद्र, अर्धपाणिक एवं महावृत्त।।२९।। षट्शिखा झषदन्तं च सूकरघ्राणमेव च । सङ्कीर्णकीलं वज्राभं पञ्चैव शयितेष्वपि ॥३०॥ ( खड़ी स्थिति की सन्धियाँ पूर्ववर्णित हैं ) लेटी स्थिति ( अथवा क्षैतिज ) की