भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१८४ मयमतम् संयुक्त होते हैं। पश्चिमी दिशा में रक्खे पदार्थ का छेद नीचे की ओर रखना चाहिये एवं इसे आधेय होना चाहिये। इस प्रकार दक्षिण से प्रारम्भ होने वाला यह संयोग ( सन्धि ) सर्वतोभद्र संज्ञक होता है।।१५-१८।। ✺ नन्द्यावर्तसन्धिः ✺ नन्द्यावर्तविधानेन नन्द्यावर्तं प्रकल्पयेत् । दक्षिणोत्तरगं दीर्घं दक्षिणे तु सकर्णकम् ।।१९।। नन्द्यावर्त सन्धि नन्द्यावर्त आकृति के अनुसार बनाई जाती है। दक्षिण से उत्तर की ओर जाने वाली लम्बाई में दक्षिण दिशा में निकला भाग कर्णकयुक्त होता है।।१९।। प्राक्प्रत्यग्गतमायामं पश्चिमे तु सकर्णकम् । दक्षिणोत्तरगं दीर्घमुत्तरे तु सकर्णकम् ।।२०।। पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले आयाम ( लम्बाई ) का कर्णक पश्चिम में होता है। दक्षिण एवं उत्तर की लम्बाई ( सन्धि के दूसरी ओर ) में उत्तर दिशा में कर्णक होता है।।२०।। पूर्वपश्चिमगं दीर्घं पूर्व्यां तु सकर्णकम् । आधाराधेयनीत्यैव पूर्वांदीनि च विन्यसेत् ।।२१।। नन्द्यावर्तमिदं तद्वदवागादीनि च क्रमात् । पूर्व एवं पश्चिम की ( दूसरी दिशा में ) लम्बाई में पूर्व दिशा में कर्णक होता है। आधार एवं आधेय नियम के अनुसार पूर्व आदि में इस प्रकार रखना चाहिये। इस नन्द्यावर्त सन्धि को दक्षिणक्रम से करना चाहिये।।२१।। ✺ स्वस्तिबन्धसन्धिः ✺ पक्षयोर्बहुभिर्द्रव्यैर्दीर्घं प्रागुदगग्रकम् ।।२२।। सशिखैश्च बहुद्रव्यैर्द्वाभ्यां वा तिर्यगग्रकम् । स्वस्त्याकृतिसमायुक्तं स्वस्तिबन्धनमिष्यते ।।२३।। जब पूर्व-उत्तर की ओर शीर्ष भाग वाले दीर्घ से बहुत से पदार्थ जुड़ते हैं, जब तिरछे अग्र भाग वाले दीर्घ से दो या बहुत से पदार्थ शिखाओं ( चूलों ) से जुड़ते हैं एवं यह योग यदि स्वस्तिक की आकृति का होता है तो इसे स्वस्तिबन्ध सन्धि कहते हैं।।२२-२३।। ✺ वर्धमानसन्धिः ✺ परितो बहुभिर्द्रव्यैर्युक्तं तद्दत्तदन्तरे । मध्येऽङ्गणसमायुक्तं बाह्ये युक्त्या सभद्रकम् ।।२४।।