मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८३ वेणुपर्वमिति प्रोक्तं तैतलानां नृणां गृहे। षड्भिस्तु सप्तभिर्द्रव्यैः सन्धयः पञ्च षट् क्रमात् ॥१२॥ (तीन एवं चार सन्धियों को) वेणुपर्व कहते हैं। यह देवालय एवं मनुष्यों के गृहों में होता है। छः एवं सात पदार्थों के योग से पाँच एवं छः सन्धियाँ बनती हैं॥१२॥ पूकपर्वेति तत् प्रोक्तं धनधान्यकरं स्मृतम्। अष्टाभिर्नवभिर्द्रव्यैः सन्धयः सप्त वाऽष्टधा ॥१३॥ (उपर्युक्त सन्धियों को) पूकपर्व कहा गया है; साथ ही इसे धन-धान्य प्रदान करने वाला कहा गया है। आठ एवं नौ पदार्थों के योग से सात एवं आठ सन्धियाँ निर्मित होती हैं॥१३॥ देवसन्धिरिति प्रोक्तः सर्ववासेषु योग्यतः। बहुसन्धिर्बहुद्रव्यैर्दीर्घमल्पं च पूर्ववत् ॥१४॥ दण्डिकेति समाख्याता धनधान्यसुखप्रदा। (पूर्वोक्त सन्धियों को) देवसन्धि कहते हैं। यह सभी प्रकार के गृहों के अनुकूल होती है। बहुत-से पदार्थों से बहुत-सी सन्धियाँ निर्मित होती हैं। इनमें दीर्घ एवं अल्प दीर्घ (कम लम्बा) के संयोग का नियम पहले की भाँति ही लगता है। इस सन्धि को दण्डिका कहा गया है। यह सन्धि धन, धान्य एवं सुख प्रदान करती है॥१४॥ ❋ सर्वतोभद्रसन्धिः ❋ दक्षिणापरभागे तु द्रव्यमूलं प्रशस्यते ॥१५॥ अग्रमग्रं तथैशान्ये तेषां बन्धनमुच्यते। आधारं प्रथमं प्राच्यां मूलाग्रच्छेदनान्वितम् ॥१६॥ दक्षिणोत्तरयोरग्रं तस्योपरि निधापयेत्। दक्षिणोत्तरयोर्मूलमूर्ध्वच्छेदनसंयुतम् ॥१७॥ पश्चिमस्थमधश्छेदं क्षेप्यमाधेययोगतः। एतत्तु सर्वतोभद्रमवागादि तथा विदुः ॥१८॥ (सर्वतोभद्र सन्धि में) दक्षिण एवं अपर भाग (दक्षिण-पूर्व) में पदार्थ का मूल रखना प्रशस्त होता है; साथ ही इसका ऊर्ध्व भाग ईशान कोण में होना चाहिये। अब इनके बन्धन का उल्लेख किया जाता है। प्रथम आधार पूर्व दिशा होती है, जहाँ मूल एवं अग्र छेद से युक्त पदार्थ रक्खा जाता है। उसके ऊपर दक्षिण एवं उत्तर में अग्र भाग से युक्त पदार्थ रक्खा जाता है। इनके मूल भाग एवं ऊर्ध्व छेद से युक्त अग्र भाग