मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 206, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें१८२ मयमतम् वामेऽवामे समद्रव्यं मध्ये दीर्घमथापि वा । मध्यद्रव्यं विना वामेऽवामे द्रव्यं समं तथा ॥६॥ अथवा वाम भाग एवं दक्षिण भाग में समान माप के द्रव्य हों तथा मध्य में स्थित पदार्थ दीर्घ हों तो उनमें सन्धि करनी चाहिये। यदि मध्य का पदार्थ न हो तथा दोनों ओर समान माप के द्रव्य हों तो भी सन्धि करनी चाहिये।।६।। एतत्सन्धिं बहिः कुर्यात् तथैवाभ्यन्तरे विदुः । स्थपतिर्हृदयस्थाने स्थित्या प्रेक्ष्य चतुर्दिशि ॥७॥ इस प्रकार गृह के बाहरी भाग की सन्धि करनी चाहिये। भीतरी भाग की सन्धि के लिये गृह के मध्य स्थान में खड़े होकर स्थपति को चारो दिशाओं का निरीक्षण करना चाहिये। जिस प्रकार बाहरी भाग की सन्धि होती है, उसी प्रकार भीतरी भाग की भी सन्धि होती है।।७।। दीर्घमल्पं समद्रव्यं पूर्ववत् परिकल्पयेत् । आधाराधेयनीत्यैव द्रव्यसन्धानमूह्यताम् ॥८॥ दीर्घ, छोटे एवं समान माप के द्रव्यों की सन्धि पूर्ववर्णित विधि से करनी चाहिये। आधार एवं आधेय के नियम ( दीर्घ का अल्प दीर्घ से, दीर्घ को मध्य में रखकर सम माप की सन्धि आदि ) का पालन करते हुये पदार्थों को जोड़ना चाहिये।।८।। मूले मूलं न युञ्जीयादग्रे चाग्रं तथैव च। मूलाग्रद्रव्ययोगेन सन्धिकर्म सुखप्रदम् ॥९॥ मूलं हि शयितञ्चाधश्चाग्रमूर्ध्वं तु योजयेत् । किसी पदार्थ के मूल को मूल से एवं अग्र भाग को अग्र भाग से नहीं जोड़ना चाहिये। मूल एवं अग्र भाग को जोड़ने से सन्धिकार्य सुखद होता है। मूल भाग को नीचे लिटा कर रखना चाहिये एवं उसके ऊपर अग्र भाग को जोड़ना चाहिये।।९।। ✺ मल्ललीलादिसन्धयः ✺ द्विद्रव्यमेकसन्धिः स्यान्मल्ललीलमिति स्मृतम् ॥१०॥ त्रिद्रव्यैस्तु द्विसन्धिः स्याद् ब्रह्मराजमितीरितम् । चतुर्भिः पञ्चभिर्द्रव्यैस्त्रिचतुः सन्धयः क्रमात् ॥११॥ दो द्रव्यों को जोड़ कर एक सन्धि होती है। इसे मल्ललील कहा गया है। तीन पदार्थों को जोड़ने से दो सन्धियाँ बनती हैं। इसे ब्रह्मराज कहते हैं। चार एवं पाँच पदार्थों के योग से क्रमशः तीन एवं चार सन्धियाँ होती हैं।।१०-११।।