भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अथ सप्तदशोऽध्यायः ( सन्धकर्मविधानम् ) पार्श्वगस्थितशयितद्रव्याणां सन्धिरुच्यते । एकस्मिन् वस्तुनि द्रव्यैर्बहुभिश्च निघट्टनात् ॥१॥ दुर्बलत्वाद् द्रुमाग्राणामबले बलवर्धनात् । सन्धकर्म प्रशस्तं स्यात् सजातीयैर्वरद्रुमैः ॥२॥ सन्धिकार्य का विधान—पार्श्व में खड़े एवं लेटे ( ऊर्ध्वाधर एवं क्षैतिज स्थिति ) पदार्थों की सन्धि होती है। एक वस्तु ( के निर्माण ) में बहुत वस्तुओं के संयोग से, वृक्ष के अग्र भाग ( के काष्ठों ) की दुर्बलता के कारण, दुर्बल के बलवृद्धि के कारण सन्धकर्म प्रशस्त होता है। समान जाति वाले वृक्षों ( कोष्ठों ) का सन्धकर्म प्रशस्त होता है।।१-२।। ✺ सन्धिभेदाः ✺ मल्ललीलं तथा ब्रह्मराजं वै वेणुपर्वकम् । पूकपर्वं देवसन्ध्दिण्डिका षड्विधाः स्मृता ॥३॥ सन्धि के भेद—सन्धियाँ छः प्रकार की होती हैं—मल्ललील, ब्रह्मराज, वेणु- पर्वक, पूकपर्व, देवसन्धि एवं दण्डिका।।३।। ✺ सन्धिविधिः ✺ चतुर्दिक्षु बहिः स्थित्वा निरीक्ष्य स्थपतिर्गृहम् । दक्षिणादक्षिणे दीर्घादीर्घाभ्यां सन्धयेत् क्रमात् ॥४॥ जोड़ने की विधि—स्थपति घर के बाहर खड़े होकर चारो दिशाओं से उसका निरीक्षण करे। तत्पश्चात् दक्षिण को उत्तर से एवं दीर्घ ( लम्बाई ) को अदीर्घ ( छोटी लम्बाई ) से क्रमशः जोड़े।।४।। मध्ये च दक्षिणे चैव यः सन्धिं कर्तुमीहते । मध्येऽतिदीर्घं युञ्जीयाद् दीर्घमल्पं च पूर्ववत् ॥५॥ यदि मध्य एवं दक्षिण में सन्धि करना चाहते हों तो मध्य के अति दीर्घ को पूर्व की भाँति छोटे दीर्घ से जोड़ना चाहिये।।५।।