मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८९ दिक्, विदिक् एवं द्वार के देवताओं के सभी भागों को छोड़कर सन्धि का प्रयोग करना चाहिये। अर्क ( सूर्य ), अर्कि ( यम ), वरुण एवं इन्दु देवों का स्थान दिक् कहलाता है ( ये दिशायें क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर हैं )।४७।। अग्निराक्षसवाय्वीशस्थानं विदिगिति स्मृतम्। गृहक्षतश्च पुष्पाख्यो भल्लाटश्च महेन्द्रकः ।।४८।। एतेषामंशकद्वारं तत्र सन्धिं न सन्ध्येत् । शल्यञ्च दन्तं त्यक्त्वैव पूर्वोक्तानाञ्च सम्मतम् ।।४९।। अग्नि, राक्षस, वायु एवं ईश देवता का स्थान विदिक् ( कोण ) कहलाता है। गृहक्षत, पुष्पाख्य, भल्लाट एवं महेन्द्र देवों का भाग द्वारभाग है। इन स्थानों पर सन्धि नहीं करनी चाहिये। पूर्व-वर्णित स्थानों पर शल्य ( कील ) एवं दन्त ( चूल ) का प्रयोग नहीं करना चाहिये ।।४८-४९।। मध्यार्धमध्यमध्यं च त्यक्त्वा युञ्जीत बुद्धिमान् । द्रव्यमध्यस्थसूत्रस्य वामेऽवामे तु दन्तकम् ।।५०।। इसी प्रकार दन्त का प्रयोग मध्य अथवा मध्यार्ध के मध्य ( चतुर्थांश भाग के बिन्दु ) को छोड़ कर करना चाहिये। दन्त का प्रयोग पदार्थ के केन्द्र-सूत्र के दाहिने एवं बाँयें भाग में करना चाहिये।।५०।। द्रव्यविस्तारमध्यस्था शिखा शीघ्रविनाशिनी । अन्योन्यसन्धिविद्धं च शिखा कीलस्य वेधनम् ।।५१।। पदार्थ के विस्तार के मध्य में स्थित शिखा ( चूल ) शीघ्र ही विनाश करती है। शिखा के लिये निर्मित स्थान में कील लगाना तथा कील के स्थान में शिखा का प्रयोग करना वेधन होता है।।५१।। धर्मार्थकामसौख्यानां विपत्तिं नित्यमादिशेत् । वामदक्षिणयोगेन प्रतिसन्धिं परित्यजेत् ।।५२।। ( उपर्युक्त वेधन ) धर्म, अर्थ, काम एवं सुख का नाश करती है। बाँयें स्थान में होने वाली सन्धि दाहिने एवं दाहिने स्थान की सन्धि बाँयें हो तो इसका ( प्रतिसन्धि का ) परित्याग करना चाहिये।।५२।। तारतीर्वान्तरस्थं यत् कल्प्यशल्यमिति स्मृतम् । पूर्ववद् विधिना सन्ध्यायाममध्ये तु योजयेत् ।।५३।। पदार्थ की चौड़ाई के बराबर स्थान पर लम्बाई में हुई सन्धि कल्प्यशल्य कहलाती