मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें१९० मयमतम् है। पूर्ववर्णित विधि से पदार्थ के मध्य स्थान को छोड़ कर सन्धि करनी चाहिये॥५३॥ अज्ञानात् त्वरयानुक्तस्थाने वा योजयेद् यदि । सर्वेषामपि वर्णानां सर्वसम्पत्क्षयो भवेत् ॥५४॥ अज्ञानता अथवा शीघ्रता के कारण वर्जित स्थान पर यदि सन्धि की जाय तो सभी वर्ण वाले गृहस्थों की सभी सम्पत्तियों का नाश होता है॥५४॥ पुराणैर्न नवद्रव्यैर्न पुराणैर्नवैरपि। नवैर्नवानां द्रव्याणां योगो जीर्णैश्च जीर्णिनाम् ॥५५॥ पुराने पदार्थों की नये पदार्थ से तथा नये पदार्थों की पुराने पदार्थों के साथ सन्धि नहीं करनी चाहिये। नये पदार्थों की नये से एवं पुराने पदार्थों का पुराने पदार्थ से सन्धि करनी चाहिये॥५५॥ युक्त्यैव द्रव्यसन्धानं सम्पदामास्पदं सदा। विपरीते विनाशाय भवेदेवेति निश्चयः ॥५६॥ उचित रीति से पदार्थों की सन्धि सम्पत्तिकारक होती है। इसके विपरीत करने से निश्चय ही विनाश होता है॥५६॥ ऊर्ध्वद्रव्याणि सर्वाणि वाजनादीनि यान्यपि। सशिखान्यशिखान्येतान्युक्त्या योज्यानि पूर्ववत् ॥५७॥ ( स्तम्भ के ) ऊपर के सभी वाजन आदि पदार्थ शिखा के साथ अथवा विना शिखा के पूर्ववर्णित विधि के अनुसार उचित रीति से जोड़ना चाहिये॥५७॥ पादोपरि भवेत् सन्धिरन्तरे नैव कारयेत् । ब्रह्मस्थलोर्ध्वगद्रव्यसन्धानं विपदां पदम् ॥५८॥ सन्धि स्तम्भ के ऊपर होती है। उनके मध्य में सन्धि नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मस्थल ( मध्य स्थान ) के ऊपर पदार्थों की सन्धि विपत्तिकारक होती है॥५८॥ ब्रह्मस्थानस्थितः स्तम्भः स्वामिनश्च विनाशनम्। तुलादीन्युपरिद्रव्याणामत्र दोषो न विद्यते ॥५९॥ ब्रह्मस्थान पर स्थित स्तम्भ गृहस्वामी का विनाश करता है। तुला आदि यदि ऊपर स्थित पदार्थ वहाँ पड़ें तो दोष नहीं होता है॥५९॥ पुंस्त्रीनपुंसकमहीरुहसन्धिकार्ये पुंसा च पुंविहितमेव तथैव पुंस्त्री। नैवोभयेन च नपुंसकस्सङ्गमः स्या- ज्जात्यैकया शुभद उक्तविधिक्रमं वा॥६०॥