मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १९१ पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुसंकलिङ्ग वृक्षों के काष्ठों के सन्धि की समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि पुरुष-काष्ठ से पुरुष-काष्ठ का एवं इसी प्रकार स्त्री-काष्ठ से स्त्रीकाष्ठ का ही सन्धिकर्म हो। इनके साथ नपुंसक काष्ठ की सन्धि नहीं होनी चाहिये। नपुंसक काष्ठ का सजातीय काष्ठ से संयोग होना चाहिये। एक जाति के काष्ठों की सन्धि शुभ परिणाम देती है।।६०।। एवं युक्त्या द्रव्यसन्धानयोगं प्रोक्तं नृणां तैतिलानां निवासे । युक्त्या युक्तं सम्पदामास्पदं तद्युक्त्यायुक्तं सर्वसम्पत्क्षयं स्यात् ॥६१॥ इस विधि से मनुष्यों एवं देवों के आवास में पदार्थों की सन्धि करनी चाहिये। इस रीति से की गई सन्धि सम्पत्ति प्रदान करती है। इसके विपरीत रीति से हुई सन्धि सभी सम्पत्तियों का नाश करती है।।६१।। छिद्रं स्वल्पतरं विधेयमधुना दीर्घान्वितच्छेदं स्थूलं काष्ठशिलेभदन्तमुदितं निम्नं हि पक्वेष्टकम् । पक्वं निर्गमनं सुधाभिरनिशं कुर्यात्तनुत्वं यथा पूर्वं मानसमुन्नयेत्तदपरं शिल्प्युत्तमः शातधीः ॥६२॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे सन्धिकर्मविधानो नाम सप्तदशोऽध्यायः अच्छे स्थपति को छोटा, किन्तु गहरा छिद्र बनाना चाहिये। कील काष्ठ, प्रस्तर या गजदन्त निर्मित से होना चाहिये। पकी ईंट में छिद्र छोटा एवं कम गहरा होना चाहिये। इसके छिद्र को सुधा के प्रयोग से पतला एवं उचित घेरे वाला बनाना चाहिये। जिनका यहाँ वर्णन नहीं किया गया है, उनके योग को बुद्धिमान स्थपति को अपनी बुद्धि द्वारा युक्तिपूर्वक करना चाहिये।।६२।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. सन्धि ( श्लोक २ ) मानसार ( १७.२ ) में काष्ठखण्डों में की जाने वाली सन्धियों का वर्णन इस प्रकार किया गया है— वृक्षमूले बलं युक्तं वृक्षाग्रे बलहीनकम्। तस्मात्तु बन्धयेत्सर्वं दारुसम्मूलतः सुधीः ।।