भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

१९४ मयमतम् दण्डिकावलयं चैव गलभूषणमिष्यते । मुष्टिबन्धोपरि क्षिप्तव्यालनाटकमूर्ध्वतः ॥६॥ दण्डिका च विधातव्या तदूर्ध्वे शिखरक्रिया । इस प्रकार इन तीन प्रकारों से ( किसी एक नियम से आवश्यकतानुसार ) प्रयत्नपूर्वक कण्ठ निर्मित करना चाहिये। उत्तरवाजन, मुष्टिबन्ध, मृणालिका, दण्डिका एवं वलय गल के भूषण होते हैं। मुष्टिबन्ध के ऊपर व्याल एवं नाट्य-दृश्य ऊपर से ( नीचे तक ) होते हैं। दण्डिका का निर्माण ( इस प्रकार ) होना चाहिये ( जिसमे ) उसके ऊपर शिखर-निर्माण हो सके॥५-६॥ ✵ शिखरभेदाः ✵ शिखरोत्सेधमात्तोच्चा भागमानवशेन वा ॥७॥ दण्डिकावधिविस्तारं पञ्चांशं द्वयंशमानकम् । सप्तनन्दशिवांशे तु त्रयोदशतिथौ तथा ॥८॥ सप्तदशांशके बन्ध्वेदभूतषडंशकम् । सप्ताष्टांशं तु तारार्धमित्यष्टौ शिखरोदयाः ॥९॥ पाञ्चालं चापि वैदेहं मागधं चापि कौरवम् । कौसलं शौरसेनं च गान्धारावन्तिकं तथा ॥१०॥ शिखर के भेद—शिखर की ऊँचाई वर्णित भाग के मान के अनुसार होती है। अथवा दण्डिका के मध्य के विस्तार के अनुसार रखी जाती है। इसका माप इस प्रकार होता है—पाँच भाग में दो भाग, सात भाग में तीन भाग, नौ भाग में चार भाग, ग्यारह भाग में पाँच भाग, तेरह भाग में छः भाग, पन्द्रह भाग में सात भाग, सत्रह भाग में आठ भाग अथवा दण्डिका की मोटाई का आधा भाग। इस प्रकार शिखर के आठ भेद बनते हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पाञ्चाल, वैदेह, मागध, कौरव, कौसल, शौरसेन, गान्धार एवं आवन्तिक। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है— १. पाँच भाग में दो भाग—पाञ्चाल २. सात भाग में तीन भाग—वैदेह ३. नौ भाग में चार भाग—मागध ४. ग्यारह भाग में पाँच भाग—कौरव ५. तेरह भाग में छः भाग—कौसल ६. पन्द्रह भाग में सात भाग—शौरसेन ७. सत्रह भाग में आठ भाग—गान्धार ८. दण्डिका मोटाई का आधा भाग—आवन्तिक ॥७-१०॥