मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टादशोऽध्यायः ( प्रासादोर्ध्ववर्गाः ) गलभूषणमेतेषां शिरश्छन्दमथाधुना । लुपामानं च वक्ष्येऽहं स्तूपिकालक्षणं क्रमात् ॥१॥ प्रासाद के ऊर्द्ध वर्ग—अब मैं ( मय ऋषि ) इन ( प्रासादों ) के गले के अलङ्करणों का, शीर्ष-भाग के आच्छादन का, लुपा के प्रमाण का एवं स्तूपिका के लक्षण का क्रमशः वर्णन करता हूँ।।१।। ✺ गललक्षणम् ✺ वेदिकाद्विगुणोत्सेधं कन्धरं शिखरोदयम् । तद्द्वित्रिगुणतुङ्गं वा वेदिकोच्चं तु वा गलम् ॥२॥ गल का लक्षण—भवन का गल वेदिका की ऊँचाई का दुगुना ऊँचा होना चाहिये। उसके ऊपर शिखरोदय गल का दुगुना अथव तीन गुना ऊँचा होना चाहिये। अथवा गल की ऊँचाई वेदिका की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये।।२।। गर्भभित्तित्रिभागैकमङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिवेशनम् । ग्रीवावेशं ततस्तावदेवं दैवे च मानवे ॥३॥ गर्भ-भित्ति ( कक्ष की दीवार ) के तीन भाग के एक भाग के बराबर अङ्घ्रि ( पाद, चरण, स्तम्भ ) की वेदी में अङ्घ्रि का निवेश होना चाहिये। इसी प्रकार भित्ति के ऊपरी भाग में ग्रीवा ( कण्ठ, गल ) का निवेश होना चाहिये। यह विधान देवालय एवं मनुष्यगृह—दोनों के लिये कहा गया है।।३।। पञ्चांशे भित्तिविष्कम्भे भागो वेद्यङ्घ्रिवेशनम् । ग्रीवावेशं ततस्तावच्चतुरंशे तथैव च ॥४॥ ( अथवा ) भित्ति-विष्कम्भ के पाँचवें भाग के बराबर पाद-निवेश की वेदिका एवं ग्रीवावेश ( कण्ठ-निवेश ) होता है। इसी प्रकार ये दोनों भित्ति-विष्कम्भ के चौथे भाग के बराबर भी हो सकते हैं।।४।। एवं त्रिविधनीत्या तु ग्रीवा साध्या प्रयत्नतः । उत्तरं वाजनं चैव मुष्टिबन्धं मृणालिका ॥५॥ मय०-१३