मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
अथाष्टादशोऽध्यायः ( प्रासादोर्ध्ववर्गाः ) गलभूषणमेतेषां शिरश्छन्दमथाधुना । लुपामानं च वक्ष्येऽहं स्तूपिकालक्षणं क्रमात् ॥१॥ प्रासाद के ऊर्द्ध वर्ग—अब मैं ( मय ऋषि ) इन ( प्रासादों ) के गले के अलङ्करणों का, शीर्ष-भाग के आच्छादन का, लुपा के प्रमाण का एवं स्तूपिका के लक्षण का क्रमशः वर्णन करता हूँ।।१।। ✺ गललक्षणम् ✺ वेदिकाद्विगुणोत्सेधं कन्धरं शिखरोदयम् । तद्द्वित्रिगुणतुङ्गं वा वेदिकोच्चं तु वा गलम् ॥२॥ गल का लक्षण—भवन का गल वेदिका की ऊँचाई का दुगुना ऊँचा होना चाहिये। उसके ऊपर शिखरोदय गल का दुगुना अथव तीन गुना ऊँचा होना चाहिये। अथवा गल की ऊँचाई वेदिका की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये।।२।। गर्भभित्तित्रिभागैकमङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिवेशनम् । ग्रीवावेशं ततस्तावदेवं दैवे च मानवे ॥३॥ गर्भ-भित्ति ( कक्ष की दीवार ) के तीन भाग के एक भाग के बराबर अङ्घ्रि ( पाद, चरण, स्तम्भ ) की वेदी में अङ्घ्रि का निवेश होना चाहिये। इसी प्रकार भित्ति के ऊपरी भाग में ग्रीवा ( कण्ठ, गल ) का निवेश होना चाहिये। यह विधान देवालय एवं मनुष्यगृह—दोनों के लिये कहा गया है।।३।। पञ्चांशे भित्तिविष्कम्भे भागो वेद्यङ्घ्रिवेशनम् । ग्रीवावेशं ततस्तावच्चतुरंशे तथैव च ॥४॥ ( अथवा ) भित्ति-विष्कम्भ के पाँचवें भाग के बराबर पाद-निवेश की वेदिका एवं ग्रीवावेश ( कण्ठ-निवेश ) होता है। इसी प्रकार ये दोनों भित्ति-विष्कम्भ के चौथे भाग के बराबर भी हो सकते हैं।।४।। एवं त्रिविधनीत्या तु ग्रीवा साध्या प्रयत्नतः । उत्तरं वाजनं चैव मुष्टिबन्धं मृणालिका ॥५॥ मय०-१३
१९४ मयमतम् दण्डिकावलयं चैव गलभूषणमिष्यते । मुष्टिबन्धोपरि क्षिप्तव्यालनाटकमूर्ध्वतः ॥६॥ दण्डिका च विधातव्या तदूर्ध्वे शिखरक्रिया । इस प्रकार इन तीन प्रकारों से ( किसी एक नियम से आवश्यकतानुसार ) प्रयत्नपूर्वक कण्ठ निर्मित करना चाहिये। उत्तरवाजन, मुष्टिबन्ध, मृणालिका, दण्डिका एवं वलय गल के भूषण होते हैं। मुष्टिबन्ध के ऊपर व्याल एवं नाट्य-दृश्य ऊपर से ( नीचे तक ) होते हैं। दण्डिका का निर्माण ( इस प्रकार ) होना चाहिये ( जिसमे ) उसके ऊपर शिखर-निर्माण हो सके॥५-६॥ ✵ शिखरभेदाः ✵ शिखरोत्सेधमात्तोच्चा भागमानवशेन वा ॥७॥ दण्डिकावधिविस्तारं पञ्चांशं द्वयंशमानकम् । सप्तनन्दशिवांशे तु त्रयोदशतिथौ तथा ॥८॥ सप्तदशांशके बन्ध्वेदभूतषडंशकम् । सप्ताष्टांशं तु तारार्धमित्यष्टौ शिखरोदयाः ॥९॥ पाञ्चालं चापि वैदेहं मागधं चापि कौरवम् । कौसलं शौरसेनं च गान्धारावन्तिकं तथा ॥१०॥ शिखर के भेद—शिखर की ऊँचाई वर्णित भाग के मान के अनुसार होती है। अथवा दण्डिका के मध्य के विस्तार के अनुसार रखी जाती है। इसका माप इस प्रकार होता है—पाँच भाग में दो भाग, सात भाग में तीन भाग, नौ भाग में चार भाग, ग्यारह भाग में पाँच भाग, तेरह भाग में छः भाग, पन्द्रह भाग में सात भाग, सत्रह भाग में आठ भाग अथवा दण्डिका की मोटाई का आधा भाग। इस प्रकार शिखर के आठ भेद बनते हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पाञ्चाल, वैदेह, मागध, कौरव, कौसल, शौरसेन, गान्धार एवं आवन्तिक। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है— १. पाँच भाग में दो भाग—पाञ्चाल २. सात भाग में तीन भाग—वैदेह ३. नौ भाग में चार भाग—मागध ४. ग्यारह भाग में पाँच भाग—कौरव ५. तेरह भाग में छः भाग—कौसल ६. पन्द्रह भाग में सात भाग—शौरसेन ७. सत्रह भाग में आठ भाग—गान्धार ८. दण्डिका मोटाई का आधा भाग—आवन्तिक ॥७-१०॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९५ यथाक्रमेण नामानि ज्ञातव्यानि विचक्षणैः । जघनाद् बहिरेवैते एकाः सर्वे समाहिताः ।।११।। सर्वे ते तैतलानां स्युरर्धादधस्तु मानुषम् । ज्ञानियों द्वारा इनका ( पाञ्चाल आदि का ) नाम क्रमशः जानना चाहिये। ये सभी जङ्घा के बाहर निकले होते हैं। इन शिखरों में नीचे वाला ( आवन्तिक ) शिखर मनुष्य के आवास के योग्य एवं शेष सभी देवालय के योग्य होते हैं।।११।। तद्दशाद्यासप्तदशभागादेकांशवर्धनात् ।।१२।। आवन्तिका प्रभृत्यूर्ध्वमष्टाविष्टलुपोदयाः । व्यामिश्रं च कलिङ्गं च तथा कौशिकमेव च ।।१३।। वराटं द्राविडं चैव बर्बरं कोल्लकं पुनः । तथा शौण्डिकमित्येते व्यामिश्रादिलुपोदयाः ।।१४।। इन आवन्तिक आदि शिखरों पर लुपा-संयोजन के लिये दश भाग से प्रारम्भ कर एक-एक अंश बढ़ाते हुये सत्रह भाग पर्यन्त आठ प्रकार की ऊँचाइयाँ प्राप्त होती हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—व्यामिश्र, कलिङ्ग, कौशिक, वराट, द्राविड, बर्बर, कोल्लक तथा शौण्डिक।।१२-१४।। ✺ शिखराकृतिः ✺ देवानां प्रथितान्येव पाषण्ड्याश्रमिणामपि । चतुरस्रं च वृत्तं च षडस्राष्टास्रमेव च ।।१५।। द्वादशास्रं द्विरष्टास्रं पद्मकुङ्मलसन्निभम् । तथामलकपक्वाभं दीर्घवृत्तं च गोलकम् ।।१६।। शिखर की आकृति—देवों एवं साधुओं-संन्यासियों का भवन के शिखरों के आकार चौकोर, वृत्ताकर, षट्कोण, अष्टकोण, द्वादश कोण, षोडश कोण, पद्माकार, पके आँवले के आकार का, लम्बी गोलाई के आकार का और गोलाकार होता है। अष्टास्राद्यष्टधाराणि हर्म्यादीनां शिरांसि हि । षडाद्याषष्टिकर्णं च सम्मतं शिखराकृतिः ।।१७।। हर्म्यों ( महलों ) के शिखर आठ कोण एवं आठ धाराओं वाले होते हैं; किन्तु ये छः कोण से लेकर साठ कोणपर्यन्त हो सकते हैं।।१७।। ✺ स्थूपिकोत्सेधः ✺ तदुच्छ्रयचतुष्पञ्चभागं स्यात् पञ्चतुङ्गकम् । तत्समोच्चत्रिभागा वा तदूर्ध्वे स्थूपिकायतः ।।१८।।
१९६ मयमतम् शिखर की ऊँचाई के चौथे या पाँचवें भाग के बराबर ऊँचा कमल होना चाहिये। उसके ऊपर पद्म के बराबर अथवा उसके तीसरे भाग के बराबर लम्बी स्थूपिका ( स्तूपिका ) होती है।।१८।। अल्पीयसी शिरोर्धा वा भागोच्चा वा त्रिभागिके । सङ्क्षेपात् स्थूपिकाभूषा ह्युपरिष्टात् प्रकाश्यते ।।१९।। अत्यन्त छोटे भवन में स्थूपिका ( स्तूपिका ) का प्रमाण शिखर का आधा अथवा तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में स्थूपिका के अलङ्करणों का वर्णन ऊपर किया गया।।१९।। ✵ लुपासंख्या ✵ पञ्चाद्येकादशान्ताश्च चतुराद्या दशान्तकाः । चतुर्विधा लुपासंख्या देवेऽदेवे निकेतने ।।२०।। देवों एवं मनुष्यों के भवन में चार प्रकार के लुपाओं ( लट्ठे, लकड़ी के पट्टे ) की संख्या होती है। यह पाँच से लेकर ग्यारह पर्यन्त ( पाँच, सात, नौ, ग्यारह ) अथवा चार से लेकर दस तक ( चार, छः, आठ, दश ) होती है।।२०।। ✵ पुष्करम् ✵ पूर्वोक्तं ह्यन्तरोच्चं तु व्यामिश्रं नाम पुष्करम् । ऊर्ध्वस्थान्यप्यधस्थानि पुष्कराण्यर्धमानतः ।।२१।। पूर्व-वर्णित अन्तर की ऊँचाई व्यामिश्र नामक पुष्कर ( शिखर का एक भाग ) की है। ऊर्ध्व-स्थित एवं अधोभाग में स्थित पुष्कर का माप आधे प्रमाण से रखना चाहिये।।२१।। अर्धमारभ्य संवर्त्य पश्चादुक्तोच्चसीमयुक् । आरोहाण्यवरोहाणि गुह्यमेतदुदाहृतम् ।।२२।। आधे प्रमाण से प्रारम्भ कर सबसे ऊँचे प्रमाण तक जाना चाहिये। इसके पश्चात् वापस ( नीचे तक ) लौटना चाहिये। आरोह एवं अवरोह का यह गोपनीय क्रम इस प्रकार वर्णित है।।२२।। ✵ लुपामानम् ✵ दण्डिकावधि तारार्धं चतुरस्त्रीकृतं समम् । कोष्णीषासनसीमाख्यसूत्रयुक्तं खलं नयेत् ।।२३।। ( दो ) दण्डिकाओं के मध्य की मोटाई ( चौड़ाई ) के आधे माप के बराबर एक
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९७ सम चतुर्भुज बनाना चाहिये। इस चतुर्भुज के चारो भुजाओं ( सूत्रों ) की संज्ञा क, उष्णीष, आसन एवं सीम होती है॥२३॥ दण्डिकोत्तरबाहुल्यं सूत्रयेदासनादधः । आसने चतुरंशाद्याद्दशांशं बिन्दु विन्यसेत् ॥२४॥ आसन सूत्र के नीचे दण्डिका एवं उत्तर के बराबर सूत्र फैलाना चाहिये ( रेखा बनानी चाहिये )। इसके पश्चात् आसनसूत्र पर चार से प्रारम्भ कर दश भागपर्यन्त ( चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दश ) बिन्दु चिह्नित करना चाहिये॥२४॥ कोष्णीषसन्धेस्तद्विन्दु सीमच्छायाोच्चमावहेत् । छायोच्चायतमानानि कमूलादासने न्यसेत् ॥२५॥ क सूत्र एवं उष्णीष सूत्र की सन्धि से उस बिन्दु को सीम की छाया ( शिखर का एक भाग ) की ऊँचाई तक ले जाना चाहिये। छाया की ऊँचाई तक लम्बाई के मान को क सूत्र के मूल से आसनसूत्र पर न्यस्त करना चाहिये॥२५॥ तान्येव दण्डिकादीनां पर्यन्तानि भवन्ति हि। कोष्णीषसङ्गात् पर्यन्तबिन्द्वन्तं तल्लुपायतम् ॥२६॥ ये ही सूत्र दण्डिका आदि तक होते हैं। लुपाओं की लम्बाई क एवं उष्णीष सूत्र के सन्धिस्थल से बिन्दु के अन्त तक होती है॥२६॥ तत्तत्पर्यन्तविस्तारं कसूत्रे विन्यसेत् पुनः। स्वस्वकर्णगतच्छायामानैः सर्वान् विमानयेत् ॥२७॥ क सूत्र पर उनका ( लुपाओं का ) विस्तार पुनः विन्यस्त करना चाहिये ( अर्थात् लुपायें कहाँ-कहाँ लगनी हैं—इसे चिह्नित करना चाहिये )। सभी को अपने कर्ण से छायामान तक मापना चाहिये॥२७॥ तत्तत्पर्यन्तसूत्राणि मल्लपर्यन्तसूत्रवत् । एवं मध्यलुपासीम्नो वर्धन्ते वर्णसंख्यया ॥२८॥ वे पर्यन्त सूत्र मल्ल ( शिखर के एक भाग ) तक सूत्र की भाँति होते हैं। इस प्रकार मध्य में स्थित लुपा अन्य लुपाओं ( पार्श्व में स्थित लुपा ) की संख्या के अनुसार बढ़ सकते हैं॥२८॥ एवमावर्त्य तत्पश्चादारोहैर्वावरोहा च। तत्तत्पुष्करसञ्जातं तत्तन्मल्लायतं विदुः ॥२९॥ इस प्रकार ( लुपा-संयोजन ) करने से तथा आरोह एवं अवरोह से पुष्कर निर्मित
१९८ मयमतम् होता है एवं इससे मल्ल की लम्बाई ज्ञात होती है।।२९।।
- पञ्चलुपाभेदाः * समध्यं च विमध्यं च लुपाकलनमेव हि। मध्यं च मध्यकर्णं चाप्याकर्णमनुकोटिकम् ।।३०।। कोटिरित्येवमुच्यन्ते पञ्च वर्णलुपाः क्रमात्। युग्मांशेऽयुग्मसंख्याभिरयुग्मे युग्मसंख्यया ।।३१।। लुपायें (अपनी स्थिति के अनुसार दो प्रकार की) समध्य (मध्य में लगने वाली) एवं विमध्य (मध्य से हट कर लगने वाली) होती हैं। लुपायें पाँच प्रकार की क्रमशः इस प्रकार होती हैं—मध्य, मध्यकर्ण, आकर्ण, अनुकोटिक एवं कोटि। यदि रेखा का विभाजन सम भागों में हुआ हो तो लुपा की संख्या विषम होती है एवं विषम भागों में सम संख्या में लुपायें होती हैं।।३०-३१।। कान्तान्तरासिकोष्णीषसीमन्तं स्वांशसंख्यया। चूलिका भ्रमणीया हि समयासमया च सा ।।३२।। तत्तत्सूत्रात् स्थिता दन्तस्तनसूत्राणि सूत्रयेत्। शयितसूत्रादधः पृष्ठवंशसूत्राणि सूत्रयेत् ।।३३।। कान्ता, अन्तरा, असिका, उष्णीष, सीमान्त, चूलिका, भ्रमणीया, समया एवं असमया उन सूत्रों से स्थित होकर दन्त एवं स्तन संज्ञक सूत्रों को सूत्र में बाँधती हैं (दन्त से स्तन संज्ञक सूत्र के मध्य उपर्युक्तों की स्थिति होती है)। नीचे स्थित शयित सूत्र (क्षैतिज सूत्र) पृष्ठवंश (लुपायें जिस पर टिकती हैं) को सूत्र में बाँधते हैं। शयितस्थितसूत्रान्तः कीलं तत्कूटमूर्धनि। निधायार्धेन्दुवत् सर्वाश्चूलिका विलिखेत् समाः ।।३४।। शयित सूत्र के भीतरी भाग में स्थित कील के ऊर्ध्व भाग में कूट को अर्धचन्द्र की भाँति स्थापित कर सभी सम चूलिकाओं को चिह्नित करना चाहिये।।३४।। लुपाविलुपमध्यान्तर्गता सा चूलिकाकृतिः। एवं स्याद् ऋजुकार्यं हि तथा कुक्कुटपक्षवत् ।।३५।। लुपा एवं विलुप के मध्य में भीतर स्थित चूलिका की आकृति निर्मित होती है। इस प्रकार ऋजु निर्मित होता है एवं इसकी आकृति कुक्कुट पक्षी के पंख के समान होती है।।३५।। बालकूटस्य विस्तारस्थितसूत्रस्तनान्तरे। कूटमध्यमसूत्रं तु वलयच्छिद्रमध्यगम् ।।३६।।
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९९ बालकूट के विस्तार में स्थित सूत्रस्तन के मध्य में, वलय के छिद्र के मध्य में स्थित कूट का मध्यम सूत्र होता है।।३६।। पर्यन्तसूत्रकादन्तर्दण्डिकोत्तरजा ततिः । तदन्तर्जानुकव्यासस्तदन्तश्शूलिकास्थितिः ॥३७॥ पर्यन्त-सूत्र से अन्तर-दण्डिका के वाम भाग में जो विस्तार होता है, वहाँ अन्तर्जानुक का व्यास एवं उसके मध्य में चूलिका की स्थिति होती है।।३७।। ☀ शिखरावयवमानानि ☀ लुपातारं तु दण्डं वा सपादं सार्धमेव वा । विस्तारत्रिचतुष्पञ्चभागेकांशं तु तद्धनम् ॥३८॥ शिखर के अङ्गों के प्रमाण—लुपा की चौड़ाई एक दण्ड, सवा दण्ड या डेढ़ दण्ड होती है तथा इसकी मोटाई का माप विस्तार का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ भाग होता है।।३८।। जानुव्यासं चोत्तरार्धचूलिकार्धार्धमेव वा । दण्डिकाविपुलं तावत् त्रिपादार्थं तु तद्धनम् ॥३९॥ जानु का व्यास उत्तर का आधा अथवा चूलिका के आधे का आधा ( चतुर्थांश ) होना चाहिये। इसकी मोटाई दण्डिका के बराबर, तीन चौथाई अथवा आधी होनी चाहिये।।३९।। वलयं जानुनीव्रं च दण्डिकाविपुलार्धतः । मल्लमध्यादिचामीली जानुकालम्बनं च यत् ॥४०॥ पर्यन्तजानुकान्तं च चूलिकाभाग एव सः । शयनात् तावदेव स्यान्नीव्रीवालम्बनसूत्रकम् ॥४१॥ वलय एवं जानु के नीव्र ( किनारा ) का माप दण्डिका के विस्तार का आधा होना चाहिये। मल्ल का मध्य एवं आदि अमीली एवं जानु के आलम्बन से जानु के अन्त तक चूलिका का अंश होता है। नीव्री का आलम्बन-सूत्र शयन से होता है। कुठारिकाललाटं च जघनं च समं मतम् । पादविष्कम्भकर्णो वा विष्कम्भद्विगुणोऽथ वा ॥४२॥ कुठारिका, ललाट एवं जघन का मान एक समान होता है। पाद-विष्कम्भ एवं कर्ण का माप समान होता है अथवा विष्कम्भ का दुगुना होता है।।४२।। कूटव्यासो लुपापिण्डी कर्णस्तद्द्विगुणायतः । तदर्धं नालिकालम्बमूर्ध्वे मल्लाग्रसङ्गतिः ॥४३॥
२०० मयमतम् कूट के व्यास के बराबर लुपा की पिण्डी होती है एवं कर्ण की लम्बाई उसकी दुगुनी होती है। उसके आधे माप का नालिका-लम्ब होता है। इसके ऊपर मल्ल के अग्र भाग को जोड़ा जाता है।।४३।। छिद्रं तत्तीव्रमात्रं स्यान्मल्लानां तु प्रवेशनम्। जानुकं च लुपामध्यं मध्यपृष्ठस्थवंशकम् ॥४४॥ समं स्यात् तीव्रताराभ्यां चूल्यंशो वा लुपान्तरम् । लुपातीव्राष्टगुणं वा वलयो वंशविस्तरः ॥४५॥ छिद्र उसकी मोटाई के अनुसार होना चाहिये, जिससे उसमें मल्लों का प्रवेश हो सके। जानुक, लुपामध्य एवं मध्य पृष्ठ पर स्थित वंश समान माप के होते हैं। उनकी मोटाई चूली के भाग अथवा लुपा के मध्य भाग के बराबर होती है। अथवा लुपा की मोटाई के आठवें भाग के बराबर वलय एवं वंश का विस्तार होता है।।४४-४५।। ✵ छादनम् ✵ तदर्धं वेशनं तीव्रं फलकैलौहलोष्टकैः । मृण्मयैस्तु यथास्थैर्यमिच्छया छादयेत् पुनः ॥४६॥ लुपोर्ध्वे फलकान् न्यस्य वाष्टबन्धमधोध्वर्तः । आच्छादन, छाजन—उपर्युक्त माप का आधा मोटा (आच्छादन होना चाहिये)। काष्ठ के फलकों, धातु के लोष्टकों (धातुनिर्मित पट्ट) अथवा मृत्तिका-निर्मित लोष्टकों से इच्छानुसार (भवन के शीर्ष को) इस प्रकार आच्छादित करना चाहिये, जिससे आच्छादन स्थिर रहे। लुपा के ऊपर फलकों (या लोष्टकों) को रखकर नीचे एवं ऊपर अष्टबन्ध (विशिष्ट गारा) लगाना चाहिये।।४६।। ✵ वलयसन्धिः ✵ लुपामध्यादधश्छिद्रं वलयस्य विधीयते ॥४७॥ क्रियायां परलेखास्तु कल्प्याः षोडशसंख्यया । कुक्षिव्यासाष्टभागैकं मात्रामानमिति स्मृतम् ॥४८॥ वलय की सन्धि—वलय के छिद्र लुपा के मध्य के नीचे होता है। इसके लिये सोलह संख्या में परलेखायें (विशिष्टरेखायें) निर्मित करनी चाहिये। इसका प्रमाण कुक्षि के व्यास के आठवें भाग के अङ्गुलिमान के बराबर होनी चाहिये।।४७-४८।। तेन भागेन सप्तार्थाद् द्वयर्धभागविवर्धनात् । आपञ्चदशसंख्यान्ताः परलेखास्तु षोडश ॥४९॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०१ उस भाग से साढ़े सात से प्रारम्भ कर ढ़ाई भाग बढ़ाते हुये पन्द्रह संख्या तक ले जाना चाहिये। इस प्रकार सोलह परलेखायें बनती हैं॥४९॥ लुपाध ऊर्ध्वबिन्द्रादि मध्ये विन्यस्य तद्विधिम् । तद्विन्द्रादि विलोक्या हि परलेखा विचक्षणैः ॥५०॥ लुपा के नीचे एवं ऊपर बिन्द्रादि को मध्य में करना चाहिये। उस बिन्द्रादि से बुद्धिमान ( स्थपति ) को परलेखा का अवलोकन करना चाहिये॥५०॥ प्रासादानामिमाः प्रोक्ता गृहादीनां च षोडश। लुपायामाद्याद्विगुणं तन्मानं तेन बुद्धिमन् ॥५१॥ प्रासादों ( महलों, देवालयों ) की ये परलेखायें गृहों में सोलह संख्याओं में होती हैं। लुपाओं में प्रथम से दुगुना मान करते हुये उनका मान बुद्धिमान ( स्थपति ) को स्वीकार करना चाहिये॥५१॥ कोष्णीषासनसूत्राभ्यामधः शफरमालिखेत् । तस्मादुपरि मल्लस्य लेखयेत् तद्विचक्षणः ॥५२॥ क, उष्णीष तथा आसन सूत्र के नीचे शफर को अङ्कित करना चाहिये। उसके ऊपर बुद्धिमान ( स्थपति ) को मल्ल का अङ्कन करना चाहिये॥५२॥ मल्लायतादधोभागे त्रिःपञ्चांशीकृतेः क्रमात्। तत्तदंशावसानं तु मत्स्यं तत्तत् समुल्लिखेत् ॥५३॥ मल्ल के नीचे लम्बाई के पन्द्रह भाग करने चाहिये। उन-उन भागों के अन्त से मत्स्य की आकृति बनानी चाहिये॥५३॥ सर्वासां परलेखानां क्रमोऽयं परिकीर्तितः । पाञ्चालादिलुपानां च प्रत्येकं प्रोच्यते बुधैः ॥५४॥ सभी परलेखाओं का यही क्रम कहा गया है। पाञ्चाल आदि लुपाओं में से प्रत्येक के विषय में बुद्धिमानों ने वर्णन किया है॥५४॥ ऋजाकार्य्युता मल्लाद् या लेखासनकाग्रयोः । मध्ये परं हि सा प्राज्ञैः परलेखा प्रकीर्तिता ॥५५॥ आसन एवं क सूत्र के अग्रभाग से एवं मल्ल से संयुक्त, मध्य भाग एवं उसके बाद सीधी रेखा को बुद्धिमानों ने परलेखा कहा है॥५५॥ ✵ घटिका ✵ लुपाबाहुल्यमानेन घटिकां चतुरश्रिकाम् । वितस्त्यायामिनीमृज्वीं कृतमध्यमसूत्रिताम् ॥५६॥
२०२ मयमतम् लुपा की चौड़ाई के मान से चौकोर घटिका का निर्माण करना चाहिये। यह एक वितस्ति ( बित्ता, बालिशत ) लम्बी, सीधी, मध्यम सूत्र से युक्त होती है॥५६॥ चूलिकान्तर्वर्णलुपातिर्यक् सूत्रस्वमध्यमात्। विन्यस्य घटिकां पश्चाच्छिद्रां शमनसूत्रवत् ॥५७॥ चूलिका, अन्तर्वर्ण, लुपा एवं तिर्यक् सूत्र के मध्य में घटिका को स्थापित करना चाहिये। इसके पश्चात् इसे शमन सूत्र के समान छिद्रयुक्त करना चाहिये॥५७॥ प्रतिवर्णं तु घटिकां तद्वर्णे तां निधापयेत्। क्षिप्तसूत्रस्य शेषांशच्छिद्रे वर्णलुपोदरे ॥५८॥ दण्डिकोत्तरवलयस्थितसूत्रसमं लिखेत्। उदरायाममध्ये तु लिखिते ककरं भवेत् ॥५९॥ प्रत्येक वर्ण की घटिका को उसके वर्ण पर स्थापित करना चाहिये। क्षिप्त सूत्र के शेष भाग के वर्ण लुपा के उदर भाग पर दण्डिका, उत्तर एवं वलय पर स्थित सम- सूत्र का आलेखन करना चाहिये। उदर भाग की लम्बाई के मध्य भाग में सम-सूत्र के अङ्कन से ककर निर्मित होता है॥५८-५९॥ घटिकाललाटमध्यं ककरं च समं यथा। तथा निधाय घटिकां लुपोदरवशायताम् ॥६०॥ तल्ललाटाकृतिच्छेद्या वलयाद्या लुपोदरे। इष्टपार्श्वे क्षिपेच्छायां छिद्रैश्च वलयस्य तु ॥६१॥ जिस प्रकार घटिका ललाट के मध्य में हो तथा ककर सम हो, उस विधि से लुपा के उदर भाग में लम्बाई में रखकर उसे ललाट की आकृति में काटना चाहिये। वलय आदि को लुपा के उदर भाग में इच्छित भाग रखना चाहिये। वलय के छिद्रों के साथ छाया को स्थापित करना चाहिये॥६०-६१॥ तत्तद्धटिकया तत्तन्मध्यसंहितमध्यया। या ललाटगतच्छाया तासां तासां तु सा भवेत् ॥६२॥ उस-उस घटिका के साथ तथा मध्य में स्थित उनके मध्य भाग से संयुक्त जो ललाट से सम्बद्ध छाया है, वह उन-उन ( घटिकाओं ) की होती है॥६२॥ दण्डिकावलयच्छिद्रस्तनजानूत्तरादिषु । शिरोमध्येऽर्धमध्ये च न्यसेन्मुण्डतुलोपरि ॥६३॥ दण्डिका, वलय, छिद्र, स्तन, जानु एवं उत्तर आदि पर, शिर के मध्य भाग में
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०३ तथा अर्ध के मध्य में तुला के ऊपर मुण्ड ( सजावटी अङ्ग ) स्थापित करना चाहिये। विटभागशिखोपेततुलापादः सवंशहृत्। सवर्णा मत्स्यबन्धाश्च खर्जूरपत्रसन्निभाः ॥६४॥ विट भाग ( शीर्ष भाग ) शिखा से युक्त, तुला-पाद से युक्त, वंश से युक्त, वर्ण से युक्त, मत्स्य-बन्ध एवं खर्जूर-पत्र के समान आकृति से युक्त होती है॥६४॥ ⁕ पुनश्छादनम् ⁕ सवलयक्षो विधातव्या लुपाः शिखरकान्तरे । लुपोर्ध्वं फलकं वोर्ध्वं तस्याः कम्पं विधाय च ॥६५॥ इष्टकासुधया वाऽपि प्रच्छादनमलङ्क्रियात्। पुनः आच्छादन—शिखर के भीतरी भाग में वलयक्ष के साथ लुपा रखनी चाहिये। लुपा के ऊपर फलक अथवा कम्प रखना चाहिये तथा सुधा ( गारा ) एवं ईंटों से आच्छादन को सुन्दर बनाना चाहिये ( अर्थात् उन्हें सही एवं सुन्दर बनाना चाहिये ) । ⁕ स्थूपिकाकीलम् ⁕ स्थूपिकाकीले दीर्घं च पादोत्सेधसमं मतम् ॥६६॥ अर्धार्धमग्रविस्तारं दण्डार्धं मूलविस्तृतम्। आशङ्कुमूलमुण्डान्तं तस्य मूलस्य वेधनम् ॥६७॥ स्तूपिका की कील—स्थूपिका ( स्तूपिका ) के कील की लम्बाई स्तम्भ की लम्बाई के बराबर होनी चाहिये। इसके शीर्ष भाग की चौड़ाई चौथाई दण्ड एवं मूल की चौड़ाई आधा दण्ड होनी चाहिये। इसके मूल का वेधन शङ्कु के मूल से लेकर मुण्ड पर्यन्त होना चाहिये॥६६-६७॥ वंशाधस्तान्निधातव्या मण्डनागाग्रपट्टिका। बालकूटस्तनं शङ्कुमूलमुण्डकमेव च ॥६८॥ वंश के नीचे मण्डनाग, अग्रपट्टिका, बालकूट, स्तन, शङ्कुमूल एवं मुण्डक स्थापित करना चाहिये॥६८॥ अन्तःस्थवलयं वर्णपट्टिका च सनालिका। मत्स्यबन्धनखर्जूरपत्रमल्लनिबन्धनात् ॥६९॥ वलक्षस्वस्तिधाराभिः शिखरान्तरलङ्क्रियात्। शिखर के भीतरी भाग की सज्जा अन्तःस्थ वलय, नालियों से युक्त वर्णपट्टिका, मत्स्यबन्धन, खर्जूरपत्र, मलय, वलक्ष तथा स्वस्ति धाराओं से करनी चाहिये॥६९॥
२०४ मयमतम् विस्तारो मुखपट्ट्याश्च दण्ड्यो वाध्यर्ध एव वा ॥७०॥ नीप्रं षडष्टभागं वा कर्णिकोच्चं तु तत्ततिः । शक्तिध्वजस्य मूलस्य विपुलं दण्डमानतः ॥७१॥ तत्कण्ठं तावदेवोच्चं सपादं सार्धमेव वा । ग्रीवान्तगग्रपत्रं तु स्तम्भव्यासार्धतुङ्गवत् ॥७२॥ मुखपट्टी का विस्तार एक दण्ड या डेढ़ दण्ड होना चाहिये। नीप्र का माप उसके छठवें या आठवें भाग के बराबर होना चाहिये एवं उसकी चौड़ाई कर्णिका की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये। शक्तिध्वज के मूल की चौड़ाई एक दण्ड होनी चाहिये। उसका कण्ठ उसके बराबर, उसका सवा भाग या डेढ़ भाग अधिक होना चाहिये। ग्रीवा के अन्त तक जाने वाले गग्रपत्र का मान स्तम्भ की चौड़ाई का आधा ऊँचा होना चाहिये। द्विदण्डादित्रिदण्डान्तमन्तरं गग्रपत्रयोः । वाताहतचलच्चारुलतावत् कर्णिकाक्रिया ॥७३॥ दो गग्रपत्रों के मध्य का भाग दो दण्ड से प्रारम्भ कर तीन दण्ड तक होना चाहिये। कर्णिका वायु के वेग से हिलती हुई लता की भाँति होनी चाहिये।।७३।। अर्धकर्णमधस्तस्माच्छिरोऽधार्धेन चानतिः । ग्रीवोपरि कपोलान्तं त्रिदण्डं सार्धमेव वा ॥७४॥ नीचे अर्धकर्ण होना चाहिये एवं उसके ऊपर शिर होना चाहिये। डेढ़ भाग से अनति होनी चाहिये। ग्रीवा के ऊपर कपोल-पर्यन्त का भाग तीन या साढ़े तीन दण्ड होना चाहिये।।७४।। तावच्छक्तिध्वजान्तं स्यात् सपत्रं वा सशूलकम् । नेत्रसंश्लिष्टमल्लं तु चूलिकास्तनमण्डलम् ॥७५॥ उससे पत्र एवं शूल से युक्त शक्तिध्वज लगा होना चाहिये। वहाँ नेत्र से युक्त मल्ल, चूलिका एवं स्तनमण्डल आदि निर्मित होना चाहिये।।७५।। शयितस्थितपट्टाभ्यां मृणाल्यादिविभूषितम् । अर्धकर्णोर्ध्वपट्टोर्ध्वप्रत्यूर्ध्वे मुष्टिबन्धनम् ॥७६॥ क्षैतिज स्थित पट्ट कमल आदि से अलङ्कृत होना चाहिये। अर्धकर्ण, ऊर्ध्वपट्ट एवं ऊर्ध्वप्रति के ऊपर मुष्टिबन्ध निर्मित होना चाहिये।।७६।। यथोशोभननिष्क्रान्तं त्रिमुखं स्यात् तदूर्ध्वतः । शूलाभं मतलाभं वा सव्यालं वा सनाटकम् ॥७७॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०५ शोभा के अनुसार निष्क्रान्त होना चाहिये। उसके ऊपर त्रिमुख होना चाहिये, जो शूल के समान, मतल के सदृश, व्याल ( गज अथवा सर्प ) के सदृश अथवा नृत्यादि के दृश्यों से युक्त हो।।७७।। ❋ ललाटभूषणम् ❋ तदूर्ध्वे कूटकोष्ठादिमण्डितं स्याद् विमानवत्। सपट्टक्षुद्रकम्पाङ्गं मध्यतोरणमेव वा ॥७८॥ ललाट के अलङ्करण—उसके ऊपर कूट एवं कोष्ठ आदि से अलङ्कृत विमान ( मन्दिर ) के सदृश रचना होनी चाहिये, जो पट्ट, क्षुद्रकम्प आदि अङ्गों अथवा मध्य तोरण से युक्त हो।।७८।। तोरणाभ्यन्तरे लक्ष्मीः साभिषेकाम्बुजासिका। एवंविधैरथान्यैश्च मण्डनीया ललाटिका ॥७९॥ तोरण के मध्य में लक्ष्मी अङ्कित होनी चाहिये, जिनका ( गजों द्वारा ) अभिषेक किया जा रहा हो एवं हाथ में कमल-पुष्प हो। इस प्रकार अथवा अन्य विधि से ललाटिका को सजाना चाहिये।।७९।। ललाटवंशसंविद्धमध्यशूलदृढीकृता । स्तम्भविस्तारविस्तीर्णा विधातव्या कुठारिका ॥८०॥ तत्कर्णं पत्रमकरं मण्डितं चावलम्बितम्। अर्धकर्णेन चार्धं वा यथायुक्ति यथारुचि ॥८१॥ ललाट के वंश विद्ध, मध्य के शूल से दृढ़ बनाई गई, एक दण्ड विस्तृत कुठारिका होनी चाहिये। इसका कर्ण पत्र एवं मकर से अलङ्कृत तथा उस पर टिका होना चाहिये। अथवा पत्र तथा मकर मध्य में या अर्धकर्ण पर रुचि एवं योजना के अनुसार निर्मित करना चाहिये।।८०-८१।। ❋ स्तूपिका ❋ अन्तर्गतलुपातिर्यगग्रबन्धनविष्टकम् । तदूर्ध्वे तेन निर्विद्धं स्तूपिका यूपमिष्यते ॥८२॥ स्तूपिका—अग्र भाग ( ऊपरी भाग ) में जोड़े गये ईंटों के मध्य में तिरछी लुपायें प्रविष्ट होती हैं। उसके ऊपर उनको भेद कर स्थूपिका-यूप निकली होती है।।८२।। पूर्वोक्तं स्तूपिकामानमलङ्कारमथोच्यते। सार्धमर्धं तदूर्ध्वेऽर्धमर्धमंशं शरांशकम् ॥८३॥
२०६ मयमतम् अंशमर्धं च भागं स्यादर्धमंशं तथार्धकम् । भागमर्धं तथाधार्शमंशमर्धं यथार्धकम् ॥८४॥ चतुरर्धं क्रमेणैवोत्तङ्गे द्वाविंशदंशके । पद्मं च क्षेपणं वेत्रं क्षेपणं पङ्कजं घटम् ॥८५॥ पङ्कजं क्षेपणं धृक् च क्षेपणं वेत्रमूर्ध्वतः । क्षेपणं धृक् च कम्पं तु पद्मं फलकमम्बुजम् ॥८६॥ वेत्रं च मुकुलं चैव क्रमेणोक्तवशान्नयेत् । स्थूपिका के प्रमाण का पहले वर्णन किया जा चुका है। अब उसके अलङ्करणों के बाईस भागों का ( प्रमाणसहित ) वर्णन किया जा रहा है; जो इस प्रकार है—पद्म : डेढ़, क्षेपण : आधा, वेत्र : आधा, क्षेपण : आधा, पङ्कज : एक, घट : पाँच, पङ्कज : एक, क्षेपण : आधा, धृक् : एक, क्षेपण : आधा, वेत्र : एक, क्षेपण : आधा, धृक् : एक, कम्प : आधा, पद्म : आधा, फलक : एक, अम्बुज : आधा, वेत्र : आधा तथा मुकुल : साढ़े चार ॥८३-८६॥ सप्तद्व्यंशत्रिकद्व्यंशैः पञ्चनन्देन्द्रियत्रिकैः ॥८७॥ द्वित्रिवेदत्रिकद्व्यंशैर्गुणपञ्चर्तुपञ्चभिः । द्वित्रिभागैः क्रमाद् व्यासं मूलपद्मादिषु न्यसेत् ॥८८॥ पद्म से प्रारम्भ कर मुकुल पर्यन्त ( ऊपर वर्णित क्रम से अङ्गों ) की चौड़ाई इस प्रकार होनी चाहिये—पद्म : सात भाग, क्षेपण : दो, वेत्र : तीन, क्षेपण : दो, पङ्कज : पाँच, घट : नौ, पङ्कज : पाँच, क्षेपण : तीन, धृक् : दो, क्षेपण : तीन, वेत्र : चार, क्षेपण : तीन, धृक् : दो, कम्प : तीन, पद्म : पाँच, फलक : छः, अम्बुज : पाँच, वेत्र : दो एवं मुकुल : तीन भाग ॥८७-८८॥ मुकुलाग्रमंशमर्धार्धं यथाशोभवशान्नयेत् । चतुरष्टद्विरष्टास्त्रं साधारं वर्तुलं तु वा ॥८९॥ मुकुल के अग्र भाग को शोभा के अनुसार एक या डेढ़ भाग बढ़ाया जा सकता है। इसका आकार चार, आठ या सोलह कोण वाला अथवा गोल रक्खा जा सकता है। जिस आकार से ऊपरी भाग को सहारा दे सके ( वही आकृति चुनी जानी चाहिये ) । तदाकृतिः शिरश्छन्दमलङ्कारवशात्तु वा । तदाकृतिः सुरोर्वीशविप्राणां च विशां मतम् ॥९०॥ अथवा इसकी आकृति भवन के शीर्ष भाग के अलङ्करण के अनुसार रखनी
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०७ चाहिये। ये आकृतियाँ देवों, राजाओं, ब्राह्मणों एवं वैश्यों के अनुकूल होती हैं।।९०।। सुरद्विजनृपाणां तु वैश्यानां नैव शूद्रके। तत्सम्बन्धं समापाद्य ध्वजदण्डं तदूर्ध्वगम् ।।९१।। एवं लक्षणसम्पन्नं विमानं सम्पदां पदम्। देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिये तो यह अनुकूल है; किन्तु शूद्रों के लिये नहीं है। इन अङ्गों को ( यथोचित रीति से ) नियोजित कर ध्वजदण्ड को उसके ऊपर रखना चाहिये। इन लक्षणों से युक्त विमान ( देवालय, ऊँचा भवन ) सम्पत्ति- कारक होता है।।९१।। ✵ लेपः सुधाकर्म च ✵ करालमुद्री गुल्माषकल्कचिक्कणसाह्वयाः ।।९२।। चूर्णोपयुक्ताः पञ्चैते सर्वकर्मसनातनाः । अभयाक्षबीजमात्रशर्कराः स्युः करालकाः ।।९३।। लेप एवं गारा—कराल, मुद्री, गुल्माष, कल्क एवं चिक्कण—ये पाँचों चूर्ण सभी ( निर्माण ) कार्यों के लिये उचित होते हैं। कराल अभया ( हर्र, हरीतकी ) अथवा अक्ष ( बहेड़ा, बिभीतक ) के बीज के बराबर आकार के कङ्कड़ होते हैं।।९२-९३।। मुद्गबीजसमा क्षुद्रशर्करा मुद्गमिष्यते । सार्धत्रिपादद्विगुणकिञ्जल्कसिकतान्वितम् ।।९४।। चूर्णस्य शर्कराशुक्त्योर्यद् गुल्माषं तदुच्यते । करालं चापि मुद्रीं च तेन मानेन योजयेत् ।।९५।। मूंग के दाने के बराबर छोटे कङ्कड़ को मुद्ग कहते हैं। डेढ़ भाग, तीन चौथाई अथवा दुगुने माप में बालू से युक्त किञ्जल्क ( कमल के सूत्र, रेशे ) में शर्करा ( कङ्कड़ ) एवं सीपियों ( के चूर्ण के साथ ) चूना मिलाने पर गुल्माष ( एक प्रकार का गारा ) तैयार होता है। कराल एवं मुद्री को भी इसी माप से तैयार किया जाता है।।९४-९५।। पूर्वोक्तमात्रसिकताचणकश्चूर्णमानतः । क्रियार्थं पेषितं कल्कं चिक्कणमस्तु केवलम् ।।९६।। पूर्व-वर्णित माप में बालू के साथ चणक ( चने के आकार का चूना ) को एक साथ पीसना चाहिये। यह कल्क होता है। चिक्कण केवल ( सादा, इसमें कुछ नहीं मिलाया जाता ) होता है।।९६।।
२०८ मयमतम् निश्छिद्रमिष्टमानेन गोत्रमिष्टकया दृढम्। पूर्वोक्तानां च पञ्चानां विधातव्यं पृथक् पृथक् ॥९७॥ पूर्ववर्णित कराल, मुद्दी आदि पदार्थों का प्रयोग अलग-अलग करना चाहिये। इनसे ईंटों को आपस में इस प्रकार जोड़ा जाता है; जिससे उनमें छिद्र शेष न रहें। तत्र तत्र तदुक्तेन द्रव्येण परिकल्पयेत् । केवलेनाम्भसा पूर्वं पूर्वांस्त्रिस्त्रिः प्रकुट्टयेत् ॥९८॥ उपर्युक्त पदार्थों में से किसी एक का चुनाव करना चाहिये। (चुने गये पदार्थ को ) केवल जल के साथ पहले तीन बार कूटना चाहिये ॥९८॥ क्षीरद्रुमकदम्बाश्राभयाक्षत्वग्जलैः पुनः। त्रिफलोदैस्ततस्तद्वन्माषयूषैस्ततस्तथा ॥९९॥ इसके पश्चात् क्षीरद्रुम, कदम्ब, आम, अभया (हर्र) तथा अक्ष (बहेड़ा) के छाल के जल के साथ, इसके पश्चात् त्रिफला (हर्र, बहेड़ा एवं आँवला) के जल के साथ, तदनन्तर उड़द के पानी के साथ (कूटा जाता है) ॥९९॥ संयम्य शर्कराशुक्तिं चूर्णं तत्खातवारिणि । खुरसङ्कुट्टनं कृत्वा स्रावयित्वाऽथ वाससा ॥१००॥ इसके पश्चात् कङ्कड़, सीपियाँ एवं चूने में कूप का (अथवा गड्ढे का) जल मिला कर खुर से विधिवत् कुटाई करना चाहिये। पुनः इसको कपड़े से छानना चाहिये ॥१००॥ कल्कं च चिक्कणं तेन कल्कनीयं विचक्षणैः । दधिदुग्धमाषयूषगुडाज्यकदलीफलैः ॥१०१॥ जलैश्च नालिकेरस्य चूतपक्वरसैः सह। कल्पितं शिल्पिभिर्यत्तद् बन्धोदकमिति स्मृतम् ॥१०२॥ इस (तरल पदार्थ) से कल्क एवं चिक्कण को बुद्धिमान (स्थपति) को तैयार करना चाहिये। दही, दूध, उड़द का पानी, गुड़, घी, केला, नारियल का पानी एवं पके आम का रस-इन पदार्थों का उचित मात्रा में संयोजन कर शिल्पी लोग 'बन्धोदक' तैयार करते हैं ॥१०१-१०२॥ शुद्धिं शुद्धोदकेनादौ कृत्वा बन्थाम्भसा ततः । आलिप्य सुधया कार्या नानारूपान्वितक्रिया ॥१०३॥ प्रथमतः साफ पानी से (भित्ति आदि) स्थान को शुद्ध कर (साफ कर) पुनः बन्धोदक का लेप करना चाहिये। लेप के पश्चात् सुधा से लेप करके विभिन्न प्रकार के
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०९ रूपों ( चित्रों ) आदि का निर्माण करना चाहिये ।। १०३ ।। दग्धैश्च मृण्मयैश्चापि लोहलोष्टैर्यथोचितम् । गोपानस्योपरिष्टात्तु च्छादनीयं विचक्षणैः ।। १०४।। गोपान के ऊपर पकी मिट्टी के द्वारा निर्मित अथवा धातु-निर्मित लोष्ट (टाइल्स ) से बुद्धिमान स्थपति को आच्छादन करना चाहिये ।। १०४।। करालश्च मुद्रिगुल्माषघनमेकैकमङ्गुलम् । कल्कमानं तदर्धेन तदर्धार्धं तु चिक्कणम् ।।१०५।। उसके ऊपर कराल, मुद्री एवं गुल्माष को एक-एक अङ्गुल, कल्क को उसका आधा ( आधा अङ्गुल ) तथा चिक्कण को कल्क का आधा मोटा रखना चाहिये।।१०५।। जलस्थलप्रयुक्ते तु यथेष्टं घनमिष्यते । षण्मासमुत्तमं प्रोक्तं चतुर्मासं तु मध्यमम् ।। १०६ ।। अधमं तु द्विमासं स्यादेषामुषितमिष्यते । ततो बन्धोदकैरेतान् संक्लेद्य क्रमशः कृतिः ।। १०७।। जल वाले स्थान पर उपर्युक्त पदार्थों को पर्याप्त मोटा लगाना चाहिये। इन्हें बन्धोदक से गीला कर यदि छः मास के लिये छोड़ दिया जाय तो उत्तम परिणाम प्राप्त होता है ( इससे ईंटों की जोड़ाई अत्यधिक दृढ़ होती है )। चार मास छोड़ने पर मध्यम एवं दो मास छोड़ने पर कम परिणाम प्राप्त होता है ।। १०६-१०७।। लुपोपरिष्टकास्तारे चैवं चूर्णक्रियां पुनः । आच्छादनीयं यत्नेन तद्घनं छादनं विदुः ।। १०८ ।। लुपाओं के ऊपर ईंटों को बिछाना चाहिये एवं उसके ऊपर चूना डालना चाहिये। छत को प्रयत्नपूर्वक ( पूर्वोक्त लेप से ) घना आच्छादित करना चाहिये ।।१०८ ।। ✹ चित्रकर्म ✹ देवानां च द्विजानां चावासे योग्यं सनातनम् । बहिरन्तश्च सर्वेषां चित्रं युञ्जीत बुद्धिमान् ।। १०९।। देवताओं एवं ब्राह्मणों के सभी भवनों के भीतर एवं बाहर बुद्धिमान व्यक्ति को चित्रों से युक्त करना चाहिये।।१०९।। सुमङ्गलकथोपेतं श्रद्धानृत्तक्रियान्वितम् । विप्रादीनां च वर्णानां निवासं सम्पदां पदम् ।।११०।। विप्र आदि सभी वर्ण वालों के गृहों में माङ्गलिक कथाओं से युक्त, श्रद्धा, नृत्य मय०-१४
२१० मयमतम् एवं नाटक आदि के चित्र बनाने चाहिये। ये चित्र गृहस्वामी को समृद्धि प्रदान करने वाले होते हैं॥११०॥ संग्रामं मरणं दुःखं देवासुरकथान्वितम्। नग्नं तपस्विलीलां चामयाव्यादि न योजयेत् ॥१११॥ अन्येषामन्यथा वासे साधनीयं यथेष्टतः । युद्ध, मृत्यु, दुःख से युक्त देवासुर की कथा का चित्रण, नग्न, तपस्वियों की लीला तथा रोगियों-दुःखियों का अङ्कन नहीं करना चाहिये। अन्य लोगों के निवास- स्थान में उनकी इच्छानुसार अङ्कन करना चाहिये॥१११॥ पञ्चांशं माषयूषं स्यान्नवाष्टांशं गुडं दधिः ॥११२॥ आज्यं द्व्यंशं तु सप्तांशं क्षीरं चर्म षडंशकम् । त्रैफलं दशभागं स्यान्नालिकेरं युगांशकम् ॥११३॥ क्षौद्रमेकांशकं त्र्यंशं कदलीफलमिष्यते । लब्धे चूर्णे दशांशे तु युञ्जीतव्यं सुबन्धनम् । सर्वेषामधिकं शस्तं गुडं च दधि दुग्धकम् ॥११४॥ (अच्छे सुबन्धन के लिये ) पाँच भाग उड़द का पानी, नौ भाग गुड़, आठ भाग दही, दो भाग घी, सात भाग क्षीर, छः भाग चर्म, दश भाग त्रिफला, चार भाग नारियल का पानी, एक भाग शहद एवं तीन भाग केला होना चाहिये। इनमें दश भाग चूना मिलाने से सुबन्धन (अच्छा मसाला, लेप ) प्राप्त होता है। इन सभी पदार्थों में गुड़, दही एवं दूध अधिक होना चाहिये॥११२-११४॥ चूर्णद्व्यंशं करालं मधुघृतकदलीनालिकेरं च माषं शुक्तेस्तोयं च दुग्धं दधिगुड़सहितं त्रैफलं तत् क्रमेण । लब्धे चूर्णे शतांशेऽशकमिदमधुना चानुवृद्धिं प्रकुर्या- देतद् बन्धं दृषद्सदृशमिति कथितं तन्त्रविद्भिर्मुनीन्द्रैः ॥११५॥ दो भाग चूना, कराल, मधु, घी, केला, नारियल, उड़द, शुक्ति (सीपी) का जल, दूध, दही, गुड़ एवं त्रिफला—इनसे प्राप्त चूर्ण में इनके सौवें भाग के बराबर चूना मिलाना चाहिये। इस विधि से तैयार बन्ध (ईंटों को जोड़ने का गारा) पत्थर के समान दृढ़ होता है—ऐसा तन्त्र के ज्ञाता ऋषियों का कथन है॥११५॥ ❋ मूर्ध्नेष्टका ❋ देवानां द्विजभूमीशवैश्यानां भवनेऽधुना ॥११६॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २११ मूर्ध्नेष्टका विधातव्याश्चतस्रो लक्षणान्विताः । सुस्निग्धाः समदग्धाश्च सुस्वनास्ताः सुशोभनाः ॥११७॥ शिरोभाग की ईंट—अब देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के भवन में मूर्ध्नेष्टका (भवन के ऊर्ध्व भाग में रक्खी जाने वाली इष्टका) रक्खी जानी चाहिये। इसे चार लक्षणों से युक्त होना चाहिये—ये चिकनी हों, भली-भाँति पकी हों, (ठोंकने पर) इससे सुन्दर स्वर उत्पन्न हो तथा देखने में सुन्दर हों।।११६-११७।। स्त्रीलिङ्गाश्चापि पुंल्लिङ्गा भिन्नच्छिद्रादिवर्जिताः । विस्तारायामतीवैस्तु प्रथमेष्टकया समाः ॥११८॥ ये ईंटें स्त्रीलिङ्ग अथवा पुंल्लिङ्ग होनी चाहिये। ये टूटी न हों तथा छिद्र आदि से रहित हों। लम्बाई, चौड़ाई एवं मोटाई में ये प्रथम ईंटों (शिलान्यास की ईंटों) के समान होती हैं।।११८।। शिलामये शिला प्रोक्ता सर्वदोषविवर्जिता । जन्माद्याशिखरान्तं च यैर्द्रव्यैश्च विनिर्मितम् ॥११९॥ तैरेवादौ तथान्ते च न्यस्तव्याश्चेष्टकाः शुभाः । मिश्रद्रव्यैश्च सङ्कीर्णे यैर्द्रव्यैरुपरी स्थितम् ॥१२०॥ तैरेव मूर्ध्नि विन्यासं रहस्यमिदमीरितम् । प्रस्तर से निर्मित भवन में शिला को सभी दोषों से रहित होना चाहिये। जन्म (नींव) से लेकर शिखर के अन्तिम भाग तक भवन जिस द्रव्य से निर्मित होता है, उसी द्रव्य (ईंटों अथवा शिलाओं) से निर्मित इष्टका को भवन के प्रारम्भ एवं अन्तिम भाग (शिखर) में भी स्थापित करना चाहिये। यह प्रशस्त होता है। मिश्रित द्रव्यों से निर्मित भवन में ऊपरी भाग में जो द्रव्य ऊपर स्थित हो, उसी द्रव्य का विन्यास भवन के ऊपरी भाग में करना चाहिये। यह रहस्य (ऋषियों द्वारा) कहा गया है। ✵ स्तूपिकाकीलम् ✵ लोहजं दारुजं वाऽपि स्तूपिकाकीलमिष्यते ॥१२१॥ स्तूपिका की कील—स्थूपिका (स्तूपिका) की कील धातुनिर्मित या काष्ठनिर्मित होनी चाहिये।।१२१।। ऊर्ध्वभूम्यङ्घ्रिणायामविस्तारं पादतः समम् । अग्रमङ्गुलविस्तारमानुपूर्व्या कृशं तथा ॥१२२॥ कील की चौड़ाई ऊर्ध्व भाग एवं अधोभाग में समान होनी चाहिये। इसकी लम्बाई
२१२ मयमतम् ( ऊपरी मञ्जिल के ) स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये तथा अग्र भाग ( ऊपरी भाग का अन्तिम भाग ) एक अङ्गुल चौड़ा एवं नीचे की अपेक्षा पतला होना चाहिये।।१२२।। चतुरस्रसमं कुर्यात् त्रिभागैकमधस्तथा। वृत्तमूर्ध्वमधः कुर्याच्छिखिपादं न्यसेदधः ॥१२३॥ कील के नीचे का एक-तिहाई भाग चौकोर होना चाहिये तथा उसके ऊपर गोलाकार होना चाहिये। इसके निचले भाग में मोर के पैर की आकृति होनी चाहिये। विस्तारत्रिगुणायामं व्यासोच्चं पादतः समम्। अभ्रभं तु यथा भूमौ पञ्चमूर्तिसमन्वितम् ॥१२४॥ इसकी लम्बाई चौड़ाई की तीन गुनी होनी चाहिये एवं चौड़ाई ऊपरी स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये। यह भूमि पर दृढ़तापूर्वक टिका रहे एवं इसे पञ्चमूर्तियों से युक्त होना चाहिये।।१२४।। अथवा तच्छिखायामद्विगुणं कीलदैर्घिकम्। स्तम्भव्यासार्धविस्तारत्रिचतुर्भागमेव वा ॥१२५॥ अथवा स्तूपिका-कील की लम्बाई भवन की शिखा की लम्बाई से दुगुनी तथा चौड़ाई स्तम्भ के व्यास की आधी, तीसरे अथवा चौथे भाग के बराबर होनी चाहिये। अग्रमर्धाङ्गुलव्यासं शिखिपादं यथाबलम्। शिखराकृतिवत् कीलं लिङ्गच्छन्दमथापि वा ॥१२६॥ एवं त्रिधा समुद्दिष्टं स्तूपिकाकीलमार्यकैः। यदि कील के अग्र भाग का व्यास आधा अङ्गुल हो तो मयूर-पाद बल की आवश्यकता के अनुसार रखना चाहिये। शिखर की आकृति के अनुसार कील की आकृति अथवा लिङ्ग की आकृति का स्तूपिका-कील निर्मित होना चाहिये। इस प्रकार तीन प्रकार के स्तूपिका-कील का वर्णन विद्वानों ने किया है।।१२६।। ✺ मूर्ध्वेष्टकादिस्थापनम् ✺ सद्मनश्चोत्तरे पार्श्वे मण्डपे तु सुसंस्कृते ॥१२७॥ चतुष्प्रदीपसंयुक्ते वस्त्रैश्च परिवेष्टिते। सर्वमङ्गलसंयुक्ते शुद्धशाल्यास्तरे शुभे ॥१२८॥ स्थण्डिले चण्डितं कृत्वा मण्डूकं वाथ तत्परम्। विन्यस्य देवान् ब्रह्मादीन् श्वेततण्डुलधारया ॥१२९॥ मूर्ध्वेष्टका आदि की स्थापना—गृह के उत्तरी भाग में मण्डप को स्वच्छ