मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २११ मूर्ध्नेष्टका विधातव्याश्चतस्रो लक्षणान्विताः । सुस्निग्धाः समदग्धाश्च सुस्वनास्ताः सुशोभनाः ॥११७॥ शिरोभाग की ईंट—अब देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के भवन में मूर्ध्नेष्टका (भवन के ऊर्ध्व भाग में रक्खी जाने वाली इष्टका) रक्खी जानी चाहिये। इसे चार लक्षणों से युक्त होना चाहिये—ये चिकनी हों, भली-भाँति पकी हों, (ठोंकने पर) इससे सुन्दर स्वर उत्पन्न हो तथा देखने में सुन्दर हों।।११६-११७।। स्त्रीलिङ्गाश्चापि पुंल्लिङ्गा भिन्नच्छिद्रादिवर्जिताः । विस्तारायामतीवैस्तु प्रथमेष्टकया समाः ॥११८॥ ये ईंटें स्त्रीलिङ्ग अथवा पुंल्लिङ्ग होनी चाहिये। ये टूटी न हों तथा छिद्र आदि से रहित हों। लम्बाई, चौड़ाई एवं मोटाई में ये प्रथम ईंटों (शिलान्यास की ईंटों) के समान होती हैं।।११८।। शिलामये शिला प्रोक्ता सर्वदोषविवर्जिता । जन्माद्याशिखरान्तं च यैर्द्रव्यैश्च विनिर्मितम् ॥११९॥ तैरेवादौ तथान्ते च न्यस्तव्याश्चेष्टकाः शुभाः । मिश्रद्रव्यैश्च सङ्कीर्णे यैर्द्रव्यैरुपरी स्थितम् ॥१२०॥ तैरेव मूर्ध्नि विन्यासं रहस्यमिदमीरितम् । प्रस्तर से निर्मित भवन में शिला को सभी दोषों से रहित होना चाहिये। जन्म (नींव) से लेकर शिखर के अन्तिम भाग तक भवन जिस द्रव्य से निर्मित होता है, उसी द्रव्य (ईंटों अथवा शिलाओं) से निर्मित इष्टका को भवन के प्रारम्भ एवं अन्तिम भाग (शिखर) में भी स्थापित करना चाहिये। यह प्रशस्त होता है। मिश्रित द्रव्यों से निर्मित भवन में ऊपरी भाग में जो द्रव्य ऊपर स्थित हो, उसी द्रव्य का विन्यास भवन के ऊपरी भाग में करना चाहिये। यह रहस्य (ऋषियों द्वारा) कहा गया है। ✵ स्तूपिकाकीलम् ✵ लोहजं दारुजं वाऽपि स्तूपिकाकीलमिष्यते ॥१२१॥ स्तूपिका की कील—स्थूपिका (स्तूपिका) की कील धातुनिर्मित या काष्ठनिर्मित होनी चाहिये।।१२१।। ऊर्ध्वभूम्यङ्घ्रिणायामविस्तारं पादतः समम् । अग्रमङ्गुलविस्तारमानुपूर्व्या कृशं तथा ॥१२२॥ कील की चौड़ाई ऊर्ध्व भाग एवं अधोभाग में समान होनी चाहिये। इसकी लम्बाई