भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२१० मयमतम् एवं नाटक आदि के चित्र बनाने चाहिये। ये चित्र गृहस्वामी को समृद्धि प्रदान करने वाले होते हैं॥११०॥ संग्रामं मरणं दुःखं देवासुरकथान्वितम्। नग्नं तपस्विलीलां चामयाव्यादि न योजयेत् ॥१११॥ अन्येषामन्यथा वासे साधनीयं यथेष्टतः । युद्ध, मृत्यु, दुःख से युक्त देवासुर की कथा का चित्रण, नग्न, तपस्वियों की लीला तथा रोगियों-दुःखियों का अङ्कन नहीं करना चाहिये। अन्य लोगों के निवास- स्थान में उनकी इच्छानुसार अङ्कन करना चाहिये॥१११॥ पञ्चांशं माषयूषं स्यान्नवाष्टांशं गुडं दधिः ॥११२॥ आज्यं द्व्यंशं तु सप्तांशं क्षीरं चर्म षडंशकम् । त्रैफलं दशभागं स्यान्नालिकेरं युगांशकम् ॥११३॥ क्षौद्रमेकांशकं त्र्यंशं कदलीफलमिष्यते । लब्धे चूर्णे दशांशे तु युञ्जीतव्यं सुबन्धनम् । सर्वेषामधिकं शस्तं गुडं च दधि दुग्धकम् ॥११४॥ (अच्छे सुबन्धन के लिये ) पाँच भाग उड़द का पानी, नौ भाग गुड़, आठ भाग दही, दो भाग घी, सात भाग क्षीर, छः भाग चर्म, दश भाग त्रिफला, चार भाग नारियल का पानी, एक भाग शहद एवं तीन भाग केला होना चाहिये। इनमें दश भाग चूना मिलाने से सुबन्धन (अच्छा मसाला, लेप ) प्राप्त होता है। इन सभी पदार्थों में गुड़, दही एवं दूध अधिक होना चाहिये॥११२-११४॥ चूर्णद्व्यंशं करालं मधुघृतकदलीनालिकेरं च माषं शुक्तेस्तोयं च दुग्धं दधिगुड़सहितं त्रैफलं तत् क्रमेण । लब्धे चूर्णे शतांशेऽशकमिदमधुना चानुवृद्धिं प्रकुर्या- देतद् बन्धं दृषद्सदृशमिति कथितं तन्त्रविद्भिर्मुनीन्द्रैः ॥११५॥ दो भाग चूना, कराल, मधु, घी, केला, नारियल, उड़द, शुक्ति (सीपी) का जल, दूध, दही, गुड़ एवं त्रिफला—इनसे प्राप्त चूर्ण में इनके सौवें भाग के बराबर चूना मिलाना चाहिये। इस विधि से तैयार बन्ध (ईंटों को जोड़ने का गारा) पत्थर के समान दृढ़ होता है—ऐसा तन्त्र के ज्ञाता ऋषियों का कथन है॥११५॥ ❋ मूर्ध्नेष्टका ❋ देवानां द्विजभूमीशवैश्यानां भवनेऽधुना ॥११६॥