मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०९ रूपों ( चित्रों ) आदि का निर्माण करना चाहिये ।। १०३ ।। दग्धैश्च मृण्मयैश्चापि लोहलोष्टैर्यथोचितम् । गोपानस्योपरिष्टात्तु च्छादनीयं विचक्षणैः ।। १०४।। गोपान के ऊपर पकी मिट्टी के द्वारा निर्मित अथवा धातु-निर्मित लोष्ट (टाइल्स ) से बुद्धिमान स्थपति को आच्छादन करना चाहिये ।। १०४।। करालश्च मुद्रिगुल्माषघनमेकैकमङ्गुलम् । कल्कमानं तदर्धेन तदर्धार्धं तु चिक्कणम् ।।१०५।। उसके ऊपर कराल, मुद्री एवं गुल्माष को एक-एक अङ्गुल, कल्क को उसका आधा ( आधा अङ्गुल ) तथा चिक्कण को कल्क का आधा मोटा रखना चाहिये।।१०५।। जलस्थलप्रयुक्ते तु यथेष्टं घनमिष्यते । षण्मासमुत्तमं प्रोक्तं चतुर्मासं तु मध्यमम् ।। १०६ ।। अधमं तु द्विमासं स्यादेषामुषितमिष्यते । ततो बन्धोदकैरेतान् संक्लेद्य क्रमशः कृतिः ।। १०७।। जल वाले स्थान पर उपर्युक्त पदार्थों को पर्याप्त मोटा लगाना चाहिये। इन्हें बन्धोदक से गीला कर यदि छः मास के लिये छोड़ दिया जाय तो उत्तम परिणाम प्राप्त होता है ( इससे ईंटों की जोड़ाई अत्यधिक दृढ़ होती है )। चार मास छोड़ने पर मध्यम एवं दो मास छोड़ने पर कम परिणाम प्राप्त होता है ।। १०६-१०७।। लुपोपरिष्टकास्तारे चैवं चूर्णक्रियां पुनः । आच्छादनीयं यत्नेन तद्घनं छादनं विदुः ।। १०८ ।। लुपाओं के ऊपर ईंटों को बिछाना चाहिये एवं उसके ऊपर चूना डालना चाहिये। छत को प्रयत्नपूर्वक ( पूर्वोक्त लेप से ) घना आच्छादित करना चाहिये ।।१०८ ।। ✹ चित्रकर्म ✹ देवानां च द्विजानां चावासे योग्यं सनातनम् । बहिरन्तश्च सर्वेषां चित्रं युञ्जीत बुद्धिमान् ।। १०९।। देवताओं एवं ब्राह्मणों के सभी भवनों के भीतर एवं बाहर बुद्धिमान व्यक्ति को चित्रों से युक्त करना चाहिये।।१०९।। सुमङ्गलकथोपेतं श्रद्धानृत्तक्रियान्वितम् । विप्रादीनां च वर्णानां निवासं सम्पदां पदम् ।।११०।। विप्र आदि सभी वर्ण वालों के गृहों में माङ्गलिक कथाओं से युक्त, श्रद्धा, नृत्य मय०-१४