मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ मयमतम् ( ऊपरी मञ्जिल के ) स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये तथा अग्र भाग ( ऊपरी भाग का अन्तिम भाग ) एक अङ्गुल चौड़ा एवं नीचे की अपेक्षा पतला होना चाहिये।।१२२।। चतुरस्रसमं कुर्यात् त्रिभागैकमधस्तथा। वृत्तमूर्ध्वमधः कुर्याच्छिखिपादं न्यसेदधः ॥१२३॥ कील के नीचे का एक-तिहाई भाग चौकोर होना चाहिये तथा उसके ऊपर गोलाकार होना चाहिये। इसके निचले भाग में मोर के पैर की आकृति होनी चाहिये। विस्तारत्रिगुणायामं व्यासोच्चं पादतः समम्। अभ्रभं तु यथा भूमौ पञ्चमूर्तिसमन्वितम् ॥१२४॥ इसकी लम्बाई चौड़ाई की तीन गुनी होनी चाहिये एवं चौड़ाई ऊपरी स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये। यह भूमि पर दृढ़तापूर्वक टिका रहे एवं इसे पञ्चमूर्तियों से युक्त होना चाहिये।।१२४।। अथवा तच्छिखायामद्विगुणं कीलदैर्घिकम्। स्तम्भव्यासार्धविस्तारत्रिचतुर्भागमेव वा ॥१२५॥ अथवा स्तूपिका-कील की लम्बाई भवन की शिखा की लम्बाई से दुगुनी तथा चौड़ाई स्तम्भ के व्यास की आधी, तीसरे अथवा चौथे भाग के बराबर होनी चाहिये। अग्रमर्धाङ्गुलव्यासं शिखिपादं यथाबलम्। शिखराकृतिवत् कीलं लिङ्गच्छन्दमथापि वा ॥१२६॥ एवं त्रिधा समुद्दिष्टं स्तूपिकाकीलमार्यकैः। यदि कील के अग्र भाग का व्यास आधा अङ्गुल हो तो मयूर-पाद बल की आवश्यकता के अनुसार रखना चाहिये। शिखर की आकृति के अनुसार कील की आकृति अथवा लिङ्ग की आकृति का स्तूपिका-कील निर्मित होना चाहिये। इस प्रकार तीन प्रकार के स्तूपिका-कील का वर्णन विद्वानों ने किया है।।१२६।। ✺ मूर्ध्वेष्टकादिस्थापनम् ✺ सद्मनश्चोत्तरे पार्श्वे मण्डपे तु सुसंस्कृते ॥१२७॥ चतुष्प्रदीपसंयुक्ते वस्त्रैश्च परिवेष्टिते। सर्वमङ्गलसंयुक्ते शुद्धशाल्यास्तरे शुभे ॥१२८॥ स्थण्डिले चण्डितं कृत्वा मण्डूकं वाथ तत्परम्। विन्यस्य देवान् ब्रह्मादीन् श्वेततण्डुलधारया ॥१२९॥ मूर्ध्वेष्टका आदि की स्थापना—गृह के उत्तरी भाग में मण्डप को स्वच्छ