मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१३ करके, चार दीपों से युक्त, वस्त्रों से आच्छादित करके सभी मंगल पदार्थों से युक्त करना चाहिये। शुद्ध शालिधान्य को बिछा कर स्थण्डिल वास्तुमण्डल अथवा मण्डूक वास्तु- मण्डल निर्मित करना चाहिये। इसके पश्चात् वास्तुमण्डल में ब्रह्मा आदि देवों का विन्यास कर उनको श्वेत तण्डुल ( अक्षत ) समर्पित करना चाहिये।। १२७-१२९।। आराध्य गन्धपुष्पाद्यैर्भुवनाधिपतिं जपेत्। देवताभ्यो बलिं दत्त्वा तत्तन्नाम्ना यथाविधि ॥१३०॥ गन्ध तथा पुष्प आदि से गृह-देवता की पूजा एवं स्तवन करना चाहिये। देवताओं को उनके नाम से विधिपूर्वक बलि प्रदान करनी चाहिये।।१३०।। स्थपतिः कलशान् न्यस्य पञ्च पञ्च सलक्षणान् । सुगन्धोदकसम्पूर्णान् पञ्चरत्नसमायुतान् ॥१३१॥ ससूत्रान् वस्त्रकूर्चालान् सापिधानान् सहेमकान् । उपपीठांशदेवानां स्वस्वनाम्नाभिधाय च ॥१३२॥ प्रणवादिनमोऽन्तेन गन्धाद्यैरर्चयेत् क्रमात्। स्थपति को पच्चीस सुन्दर लक्षणों वाले कलश स्थापित करने चाहिये। इन कलशों में सुगन्धित जल भरना चाहिये तथा पाँच रत्नों को डालना चाहिये। सूत्र, वस्त्र, कूर्च तथा स्वर्ण से युक्त करके इन कलशों को ढँक देना चाहिये। उपपीठ संज्ञक वास्तुमण्डल में देवों को उनके नाम से आहूत कर 'ॐ' से प्रारम्भ कर 'नमः' से अन्त करते हुये उन देवों की गन्ध आदि से क्रमशः पूजा करनी चाहिये।।१३१-१३२।। प्रक्षाल्य पञ्चगव्यैस्तु नवरत्नकुशोदकैः ॥१३३॥ इष्टकाश्च यथाकीलं सूत्रैरावेष्टयेत् क्रमात्। कुम्भस्य दक्षिणे शुद्धशालीस्थण्डिलमण्डले ॥१३४॥ इष्टकाओं एवं कील को पञ्चगव्य से, नवरत्नों एवं कुशा के जल से प्रक्षालित करके क्रमशः सूत्रों से लपेटना चाहिये। प्रत्येक कुम्भ के दाहिने भाग में शुद्ध शालि- धान्य के द्वारा निर्मितस्थण्डिल वास्तुमण्डल में— ॥१३३-१३४॥ आराध्य गन्धपुष्पैश्च बलिं दत्त्वा यथाविधि। इष्टकाश्चैव कीलांश्च वेष्टयेदम्बरैः शुभैः ॥१३५॥ वास्तुदेवों की पूजा गन्ध एवं पुष्पों से करके एवं उन्हें विधि के अनुसार बलि प्रदान कर ईंटों एवं कीलों को शुभ वस्त्र से लपेटना चाहिये।।१३५।। श्वेतवस्त्रास्तरस्योर्ध्वे न्यसेद् दर्भास्तरे शुचिः। स्थपतिर्वरवेषाढ्यः शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥१३६॥