भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२१४ मयमतम् सितवस्त्रपरिच्छिन्नोत्तरीयो हैममुद्रिकः । पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत् सुधीः ॥१३७॥ श्वेत वस्त्र के आस्तरण ( चादर, बिछा वस्त्र ) के ऊपर बिछे हुये पवित्र कुश पर इष्टका एवं कीलों को रखना चाहिये। स्थपति को अच्छा वेष, श्वेत पुष्पों की माला, श्वेत ( चन्दन ) का लेप, श्वेत वस्त्र के उत्तरीय को ऊपर ओढ़ कर तथा सुवर्णनिर्मित अंगूठी धारण कर शुद्ध जल पीना चाहिये तथा रात्रि में उपवास रखते हुये वहीं निवास करना चाहिये।।१३६-१३७।। कलशस्योत्तरे पार्श्वे सितवस्त्रपरिस्तरे । ततः प्रभाते विमले नक्षत्रकरणान्विते ॥१३८॥ सुमुहूर्ते सुलग्ने च स्थपतिः स्थापकेन तु । पुष्पकुण्डलहारादिकटकैरङ्गुलीयकैः ॥१३९॥ पञ्चाङ्गभूषणैर्हैमनिर्मितैस्तु विभूषितः । हेमयज्ञोपवीतस्तु नववस्त्रपरिच्छदः ॥१४०॥ श्वेतानुलेपनश्चैव सितपुष्पशिराः शुचिः । स्थपति को ( रात्रि में ) कलश के उत्तरी भाग में श्वेत वस्त्र के बिस्तर ( अथवा चादर, बिछावन ) पर रहना चाहिये। इसके पश्चात् प्रभात वेला में शुद्ध नक्षत्र एवं करण में, सुन्दर मुहूर्त एवं शुभ लग्न में स्थपति को स्थापक ( भवन-स्वामी ) के साथ पुष्प, कुण्डल, हार, कटक ( हाथ के आभूषण ) एवं अंगूठी—इन पाँच अंगों के सुवर्ण- निर्मित आभूषणों से अलङ्कृत होकर सुवर्ण-निर्मित जनेऊ तथा नवीन वस्त्र का परिच्छद ( ओढ़ने का वस्त्र ) धारण करना चाहिये। श्वेत लेप तथा सिर पर सफेद पुष्प धारण करना चाहिये एवं पवित्र होना चाहिये।।१३८-१४०।। ध्यात्वा धरातलं सर्वं दिग्द्विपेन्द्रसमायुतम् ॥१४१॥ ससागरं सशैलेन्द्रमनन्तस्योपरि स्थितम् । सृष्टिस्थितिलयाधारं भुवनाधिपतिं जपेत् ॥१४२॥ ( पवित्र तन एवं मन से ) दिशाओं के गजों, समुद्रों एवं पर्वतों से युक्त तथा अनन्त सर्प पर स्थित पृथिवी का ध्यान करते हुये सृष्टि, स्थिति एवं प्रलय के आधार, भुवनों के अधिपति देवता का जप ( स्तुति ) करना चाहिये।।१४१-१४२।। स्नापयित्वेष्टकाकीलं पूर्वोक्तैः कलशोदकैः । आराध्य गन्धपुष्पैश्च धूपदीपसमन्वितैः ॥१४३॥