मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१५ पूर्ववर्णित कलशों के जलों से इष्टका एवं कील को स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप एवं दीप से वास्तुदेवों की पूजा करनी चाहिये।।१४३।। बलिं दत्त्वा यथान्यायं जयशब्दादिमङ्गलैः । विप्रस्वाध्यायघोषैश्च शङ्खभेर्यादिनिःस्वनैः ॥१४४॥ स्थापयेदिष्टकाः सम्यक् पूर्वदक्षिणतः क्रमात् । शिखरार्धे विमानस्य गग्रपत्रान्तरेऽपि वा ॥१४५॥ नियमानुसार वास्तुदेवों को बलि प्रदान कर जय आदि मङ्गल शब्दों, ब्राह्मणों द्वारा किये जा रहे वेदपाठ एवं शङ्ख तथा भेरी आदि वाद्यों की ध्वनि के साथ मूर्ध्नेष्टका को क्रमानुसार पूर्व से दक्षिण क्रम में स्थापित करना चाहिये। इसे विमान ( भवन ) के शिखर के अर्ध भाग में अथवा गग्र एवं पत्र के मध्य में स्थापित करना चाहिये। शिखरत्रिचतुर्भागावसाने वाम्बुजादधः । तदाद्यात् स्तूपिकायामात् कीलदैर्घ्यं प्रगृह्यताम् ॥१४६॥ शिखर के तीसरे अथवा चौथे भाग के अन्त तक, पद्म के नीचे से, स्तूपिका ( स्तूपिका ) की लम्बाई से कील की लम्बाई ग्रहण करनी चाहिये।।१४६।। पूर्वमेवेष्टकास्थानं निश्छिद्रं तु दृढीकृतम् । तन्मध्ये नवरत्नानि विन्यसेच्च यथाक्रमम् ॥१४७॥ इष्टका के स्थान को पहले ही छिद्ररहित एवं दृढ़ कर देना चाहिये; साथ ही उसके मध्य में नवरत्नों को क्रमानुसार रखना चाहिये।।१४७।। ऐन्द्रे मरकतं विद्याद् वैडूर्य वह्निगोचरे । इन्द्रनीलं तु याम्यायां मौक्तिकं पितरि स्मृतम् ॥१४८॥ इन्द्र के पद पर मरकत मणि, अग्नि के पद पर वैडूर्य मणि, यम के स्थान पर इन्द्रनील मणि एवं पितृपद पर मोती स्थापित करना चाहिये।।१४८।। वारुणे स्फाटिकं विद्यान्महानीलं समीरणे । वज्रं तु सौम्यदेशे स्यादैशान्यां तु प्रवालकम् ॥१४९॥ वरुण के स्थान पर स्फटिक, वायु के स्थान पर महानील मणि, सोम के पद पर वज्र ( हीरा ) तथा ईशान में प्रवाल ( मूँगा ) स्थापित करना चाहिये।।१४९।। माणिक्यं मध्यमे भागे हाटकं च विनिक्षिपेत् । रसोपरसबीजैश्च धान्यान्यप्यौषधानि च ॥१५०॥ मध्य भाग में माणिक्य, सोना, रस ( धातुनिर्मित अन्न के दाने ), उपरस ( रंगे