मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ मयमतम् हुये पदार्थ ), बीज, धान्य ( अन्न ) एवं औषध ( जड़ी ) डालना चाहिये।।१५०।। तदूर्ध्वे स्थूपिकाकीलं स्थापयेदचलं समम्। तस्मात् प्रकृतिभूम्यन्तमुदग्दिशि महाध्वजम् ।।१५१।। उसके ऊपर बराबर एवं स्थिर करते हुये स्तूपिका-कील स्थापित करना चाहिये। इससे निचली भूमि तक उत्तर दिशा में महाध्वज स्थापित होता है।।१५१।। ग्रथितं क्षौमवस्त्रैश्च कार्पासैर्वा मनोहरैः। लम्बयेत्तदुदक्प्राच्यो प्रागुदग्वि दिशं ततः ।।१५२।। संस्पृशेद् यदि सर्वेषां प्राणिनां सम्पद्वृद्धये । इसे रेशमी वस्त्र अथवा सूती वस्त्र से निर्मित सुन्दर ( ध्वज ) ईशान कोण में लटकाना चाहिये। यदि यह ईशान कोण की भूमि को छूता है तो वह भवन सभी ( वर्णों ) के प्राणियों के लिये सम्पत्ति एवं समृद्धिकारक होता है।।१५२।। भवनं स्थूपिकीलं च पट्टैरावेष्ट्य शुभ्रकैः ।।१५३।। चतुर्दिक्षु चतुर्गाश्च सवत्साः सन्निवेशयेत्। द्वारालङ्करणं कुर्यात् सुविचित्राम्बरैर्नवैः ।।१५४।। भवन के स्थूपिकील ( स्तूपिका-कील ) को श्वेत वस्त्रों से लपेट कर चारो दिशाओं में बछड़ों के साथ चार गायें रखनी चाहिये। द्वार को नये रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजाना चाहिये।।१५३-१५४।। ☸ दक्षिणादानम् ☸ यजमानो विशुद्धात्मा प्रणम्य शिरसा गुरुम्। विमानस्थूपिकास्तम्भद्वारालङ्करणानि च ।।१५५।। वस्त्राणि धनधान्यैश्च पशूनपि सवत्सकान्। मुदा स्थपतये दत्त्वा शेषान् भक्त्या तु तर्पयेत् ।।१५६।। दान-दक्षिणा- यजमान ( गृहस्वामी ) को शुद्ध मन-मस्तिष्क से गुरु ( प्रधान आचार्य ), विमान ( भवन या मन्दिर ), स्थूपिका ( स्तूपिका ), स्तम्भ, द्वार एवं सज्जा को प्रणाम कर प्रसन्न भाव से स्थपति को वस्त्र, धन, अन्न एवं बछड़े सहित पशु ( गाय ) प्रदान करना चाहिये एवं शेष ( उसके सहायकों ) को भक्तिपूर्वक ( धनादि द्वारा ) तृप्त करना चाहिये।।१५५-१५६।। ☸ रत्नादिस्थानम् ☸ एवं मुनिवरैः प्रोक्तं प्रसादानां तु मूर्धनि। हर्म्याणां गर्भसंयुक्तौ नेत्रभित्तौ तलान्तरे ।।१५७।।