मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१७ मण्डपे मध्यदेशे तु सभादीनामधोऽम्बुजात्। प्रासादवद् विधातव्यं गोपुराणां तु मूर्धनि ॥१५८॥ रत्न आदि का स्थान—इस प्रकार प्रासादों के शिरोभाग में, भवन के शिलान्यास से जुड़े भित्तियों में, प्रत्येक तल के बीच में, मण्डप में, मध्य भाग में, सभागार आदि में, शिखर पर स्थित पद्म के नीचे एवं गोपुर द्वारों के शीर्ष भाग में प्रासाद के सदृश रत्नादि स्थापित करना चाहिये—ऐसा श्रेष्ठ मुनियों का वचन है॥१५७-१५८॥ ❋ कर्मसमाप्तिः ❋ एवं तु विधिना सम्यक् सम्पन्नं सम्पदां पदम्। येन यत् कर्म चारब्धमादौ तदवसानके ॥१५९॥ कार्य की समाप्ति—इस प्रकार भवन-निर्माण के प्रारम्भ में एवं अन्त में विधिपूर्वक सभी क्रियायें सम्पन्न करने से गृह में सम्पदा आती है॥१५९॥ तेनैव निष्ठितं कर्म श्रीसौभाग्यायुरेधनम्। तस्याभावे तु तत्पुत्रः शिष्यो वा तं गुरुं पटे ॥१६०॥ लिखित्वा तन्नियोगेन सर्वकर्म समाचरेत्। अज्ञानात् त्वरितेनापि यद्वस्त्वन्येन भावितम्। करोति स्वामिनं शीघ्रमन्यथेति ह निश्चयः ॥१६१॥ गृहस्वामी के द्वारा विधिपूर्वक किया गया कर्म श्री, सौभाग्य, आयु एवं धन प्रदान करता है। गृहस्वामी के अभाव में उसका पुत्र अथवा शिष्य उसकी आकृति को वस्त्र पर रेखाङ्कित कर उसके (वस्त्र पर अंकित चित्र के) द्वारा सभी कार्यों को सम्पन्न करे। अन्य व्यक्ति के द्वारा किया गया कार्य यदि शीघ्रता अथवा अज्ञानतावश सही रीति से नहीं होता है तो गृहस्वामी को विपरीत परिणाम प्राप्त होता है॥१६०-१६१॥ प्रथमं कृतवान् विधिं यथावत् कृतवानेव करोति निष्ठितान्तम्। अथ वा विधिरन्यथा भवेच्चे- दशुभं स्वामिनमन्यथा करोति ॥१६२॥ गृहकर्ता जिस विधि से कार्य का प्रारम्भ करे, उसी विधि से कार्य करते हुये समापन करना चाहिये। यदि बीच में अन्य विधि का अनुसरण किया जाय तो गृहस्वामी का अशुभ होता है॥१६२॥ एवं ग्रीवालङ्कृतं पुष्कराभं मानं मल्लानां शिखाभूषणं च।