मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ मयमतम् अंशमर्धं च भागं स्यादर्धमंशं तथार्धकम् । भागमर्धं तथाधार्शमंशमर्धं यथार्धकम् ॥८४॥ चतुरर्धं क्रमेणैवोत्तङ्गे द्वाविंशदंशके । पद्मं च क्षेपणं वेत्रं क्षेपणं पङ्कजं घटम् ॥८५॥ पङ्कजं क्षेपणं धृक् च क्षेपणं वेत्रमूर्ध्वतः । क्षेपणं धृक् च कम्पं तु पद्मं फलकमम्बुजम् ॥८६॥ वेत्रं च मुकुलं चैव क्रमेणोक्तवशान्नयेत् । स्थूपिका के प्रमाण का पहले वर्णन किया जा चुका है। अब उसके अलङ्करणों के बाईस भागों का ( प्रमाणसहित ) वर्णन किया जा रहा है; जो इस प्रकार है—पद्म : डेढ़, क्षेपण : आधा, वेत्र : आधा, क्षेपण : आधा, पङ्कज : एक, घट : पाँच, पङ्कज : एक, क्षेपण : आधा, धृक् : एक, क्षेपण : आधा, वेत्र : एक, क्षेपण : आधा, धृक् : एक, कम्प : आधा, पद्म : आधा, फलक : एक, अम्बुज : आधा, वेत्र : आधा तथा मुकुल : साढ़े चार ॥८३-८६॥ सप्तद्व्यंशत्रिकद्व्यंशैः पञ्चनन्देन्द्रियत्रिकैः ॥८७॥ द्वित्रिवेदत्रिकद्व्यंशैर्गुणपञ्चर्तुपञ्चभिः । द्वित्रिभागैः क्रमाद् व्यासं मूलपद्मादिषु न्यसेत् ॥८८॥ पद्म से प्रारम्भ कर मुकुल पर्यन्त ( ऊपर वर्णित क्रम से अङ्गों ) की चौड़ाई इस प्रकार होनी चाहिये—पद्म : सात भाग, क्षेपण : दो, वेत्र : तीन, क्षेपण : दो, पङ्कज : पाँच, घट : नौ, पङ्कज : पाँच, क्षेपण : तीन, धृक् : दो, क्षेपण : तीन, वेत्र : चार, क्षेपण : तीन, धृक् : दो, कम्प : तीन, पद्म : पाँच, फलक : छः, अम्बुज : पाँच, वेत्र : दो एवं मुकुल : तीन भाग ॥८७-८८॥ मुकुलाग्रमंशमर्धार्धं यथाशोभवशान्नयेत् । चतुरष्टद्विरष्टास्त्रं साधारं वर्तुलं तु वा ॥८९॥ मुकुल के अग्र भाग को शोभा के अनुसार एक या डेढ़ भाग बढ़ाया जा सकता है। इसका आकार चार, आठ या सोलह कोण वाला अथवा गोल रक्खा जा सकता है। जिस आकार से ऊपरी भाग को सहारा दे सके ( वही आकृति चुनी जानी चाहिये ) । तदाकृतिः शिरश्छन्दमलङ्कारवशात्तु वा । तदाकृतिः सुरोर्वीशविप्राणां च विशां मतम् ॥९०॥ अथवा इसकी आकृति भवन के शीर्ष भाग के अलङ्करण के अनुसार रखनी