मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०७ चाहिये। ये आकृतियाँ देवों, राजाओं, ब्राह्मणों एवं वैश्यों के अनुकूल होती हैं।।९०।। सुरद्विजनृपाणां तु वैश्यानां नैव शूद्रके। तत्सम्बन्धं समापाद्य ध्वजदण्डं तदूर्ध्वगम् ।।९१।। एवं लक्षणसम्पन्नं विमानं सम्पदां पदम्। देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिये तो यह अनुकूल है; किन्तु शूद्रों के लिये नहीं है। इन अङ्गों को ( यथोचित रीति से ) नियोजित कर ध्वजदण्ड को उसके ऊपर रखना चाहिये। इन लक्षणों से युक्त विमान ( देवालय, ऊँचा भवन ) सम्पत्ति- कारक होता है।।९१।। ✵ लेपः सुधाकर्म च ✵ करालमुद्री गुल्माषकल्कचिक्कणसाह्वयाः ।।९२।। चूर्णोपयुक्ताः पञ्चैते सर्वकर्मसनातनाः । अभयाक्षबीजमात्रशर्कराः स्युः करालकाः ।।९३।। लेप एवं गारा—कराल, मुद्री, गुल्माष, कल्क एवं चिक्कण—ये पाँचों चूर्ण सभी ( निर्माण ) कार्यों के लिये उचित होते हैं। कराल अभया ( हर्र, हरीतकी ) अथवा अक्ष ( बहेड़ा, बिभीतक ) के बीज के बराबर आकार के कङ्कड़ होते हैं।।९२-९३।। मुद्गबीजसमा क्षुद्रशर्करा मुद्गमिष्यते । सार्धत्रिपादद्विगुणकिञ्जल्कसिकतान्वितम् ।।९४।। चूर्णस्य शर्कराशुक्त्योर्यद् गुल्माषं तदुच्यते । करालं चापि मुद्रीं च तेन मानेन योजयेत् ।।९५।। मूंग के दाने के बराबर छोटे कङ्कड़ को मुद्ग कहते हैं। डेढ़ भाग, तीन चौथाई अथवा दुगुने माप में बालू से युक्त किञ्जल्क ( कमल के सूत्र, रेशे ) में शर्करा ( कङ्कड़ ) एवं सीपियों ( के चूर्ण के साथ ) चूना मिलाने पर गुल्माष ( एक प्रकार का गारा ) तैयार होता है। कराल एवं मुद्री को भी इसी माप से तैयार किया जाता है।।९४-९५।। पूर्वोक्तमात्रसिकताचणकश्चूर्णमानतः । क्रियार्थं पेषितं कल्कं चिक्कणमस्तु केवलम् ।।९६।। पूर्व-वर्णित माप में बालू के साथ चणक ( चने के आकार का चूना ) को एक साथ पीसना चाहिये। यह कल्क होता है। चिक्कण केवल ( सादा, इसमें कुछ नहीं मिलाया जाता ) होता है।।९६।।