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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०७ चाहिये। ये आकृतियाँ देवों, राजाओं, ब्राह्मणों एवं वैश्यों के अनुकूल होती हैं।।९०।। सुरद्विजनृपाणां तु वैश्यानां नैव शूद्रके। तत्सम्बन्धं समापाद्य ध्वजदण्डं तदूर्ध्वगम् ।।९१।। एवं लक्षणसम्पन्नं विमानं सम्पदां पदम्। देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिये तो यह अनुकूल है; किन्तु शूद्रों के लिये नहीं है। इन अङ्गों को ( यथोचित रीति से ) नियोजित कर ध्वजदण्ड को उसके ऊपर रखना चाहिये। इन लक्षणों से युक्त विमान ( देवालय, ऊँचा भवन ) सम्पत्ति- कारक होता है।।९१।। ✵ लेपः सुधाकर्म च ✵ करालमुद्री गुल्माषकल्कचिक्कणसाह्वयाः ।।९२।। चूर्णोपयुक्ताः पञ्चैते सर्वकर्मसनातनाः । अभयाक्षबीजमात्रशर्कराः स्युः करालकाः ।।९३।। लेप एवं गारा—कराल, मुद्री, गुल्माष, कल्क एवं चिक्कण—ये पाँचों चूर्ण सभी ( निर्माण ) कार्यों के लिये उचित होते हैं। कराल अभया ( हर्र, हरीतकी ) अथवा अक्ष ( बहेड़ा, बिभीतक ) के बीज के बराबर आकार के कङ्कड़ होते हैं।।९२-९३।। मुद्गबीजसमा क्षुद्रशर्करा मुद्गमिष्यते । सार्धत्रिपादद्विगुणकिञ्जल्कसिकतान्वितम् ।।९४।। चूर्णस्य शर्कराशुक्त्योर्यद् गुल्माषं तदुच्यते । करालं चापि मुद्रीं च तेन मानेन योजयेत् ।।९५।। मूंग के दाने के बराबर छोटे कङ्कड़ को मुद्ग कहते हैं। डेढ़ भाग, तीन चौथाई अथवा दुगुने माप में बालू से युक्त किञ्जल्क ( कमल के सूत्र, रेशे ) में शर्करा ( कङ्कड़ ) एवं सीपियों ( के चूर्ण के साथ ) चूना मिलाने पर गुल्माष ( एक प्रकार का गारा ) तैयार होता है। कराल एवं मुद्री को भी इसी माप से तैयार किया जाता है।।९४-९५।। पूर्वोक्तमात्रसिकताचणकश्चूर्णमानतः । क्रियार्थं पेषितं कल्कं चिक्कणमस्तु केवलम् ।।९६।। पूर्व-वर्णित माप में बालू के साथ चणक ( चने के आकार का चूना ) को एक साथ पीसना चाहिये। यह कल्क होता है। चिक्कण केवल ( सादा, इसमें कुछ नहीं मिलाया जाता ) होता है।।९६।।

२०८ मयमतम् निश्छिद्रमिष्टमानेन गोत्रमिष्टकया दृढम्। पूर्वोक्तानां च पञ्चानां विधातव्यं पृथक् पृथक् ॥९७॥ पूर्ववर्णित कराल, मुद्दी आदि पदार्थों का प्रयोग अलग-अलग करना चाहिये। इनसे ईंटों को आपस में इस प्रकार जोड़ा जाता है; जिससे उनमें छिद्र शेष न रहें। तत्र तत्र तदुक्तेन द्रव्येण परिकल्पयेत् । केवलेनाम्भसा पूर्वं पूर्वांस्त्रिस्त्रिः प्रकुट्टयेत् ॥९८॥ उपर्युक्त पदार्थों में से किसी एक का चुनाव करना चाहिये। (चुने गये पदार्थ को ) केवल जल के साथ पहले तीन बार कूटना चाहिये ॥९८॥ क्षीरद्रुमकदम्बाश्राभयाक्षत्वग्जलैः पुनः। त्रिफलोदैस्ततस्तद्वन्माषयूषैस्ततस्तथा ॥९९॥ इसके पश्चात् क्षीरद्रुम, कदम्ब, आम, अभया (हर्र) तथा अक्ष (बहेड़ा) के छाल के जल के साथ, इसके पश्चात् त्रिफला (हर्र, बहेड़ा एवं आँवला) के जल के साथ, तदनन्तर उड़द के पानी के साथ (कूटा जाता है) ॥९९॥ संयम्य शर्कराशुक्तिं चूर्णं तत्खातवारिणि । खुरसङ्कुट्टनं कृत्वा स्रावयित्वाऽथ वाससा ॥१००॥ इसके पश्चात् कङ्कड़, सीपियाँ एवं चूने में कूप का (अथवा गड्ढे का) जल मिला कर खुर से विधिवत् कुटाई करना चाहिये। पुनः इसको कपड़े से छानना चाहिये ॥१००॥ कल्कं च चिक्कणं तेन कल्कनीयं विचक्षणैः । दधिदुग्धमाषयूषगुडाज्यकदलीफलैः ॥१०१॥ जलैश्च नालिकेरस्य चूतपक्वरसैः सह। कल्पितं शिल्पिभिर्यत्तद् बन्धोदकमिति स्मृतम् ॥१०२॥ इस (तरल पदार्थ) से कल्क एवं चिक्कण को बुद्धिमान (स्थपति) को तैयार करना चाहिये। दही, दूध, उड़द का पानी, गुड़, घी, केला, नारियल का पानी एवं पके आम का रस-इन पदार्थों का उचित मात्रा में संयोजन कर शिल्पी लोग 'बन्धोदक' तैयार करते हैं ॥१०१-१०२॥ शुद्धिं शुद्धोदकेनादौ कृत्वा बन्थाम्भसा ततः । आलिप्य सुधया कार्या नानारूपान्वितक्रिया ॥१०३॥ प्रथमतः साफ पानी से (भित्ति आदि) स्थान को शुद्ध कर (साफ कर) पुनः बन्धोदक का लेप करना चाहिये। लेप के पश्चात् सुधा से लेप करके विभिन्न प्रकार के

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०९ रूपों ( चित्रों ) आदि का निर्माण करना चाहिये ।। १०३ ।। दग्धैश्च मृण्मयैश्चापि लोहलोष्टैर्यथोचितम् । गोपानस्योपरिष्टात्तु च्छादनीयं विचक्षणैः ।। १०४।। गोपान के ऊपर पकी मिट्टी के द्वारा निर्मित अथवा धातु-निर्मित लोष्ट (टाइल्स ) से बुद्धिमान स्थपति को आच्छादन करना चाहिये ।। १०४।। करालश्च मुद्रिगुल्माषघनमेकैकमङ्गुलम् । कल्कमानं तदर्धेन तदर्धार्धं तु चिक्कणम् ।।१०५।। उसके ऊपर कराल, मुद्री एवं गुल्माष को एक-एक अङ्गुल, कल्क को उसका आधा ( आधा अङ्गुल ) तथा चिक्कण को कल्क का आधा मोटा रखना चाहिये।।१०५।। जलस्थलप्रयुक्ते तु यथेष्टं घनमिष्यते । षण्मासमुत्तमं प्रोक्तं चतुर्मासं तु मध्यमम् ।। १०६ ।। अधमं तु द्विमासं स्यादेषामुषितमिष्यते । ततो बन्धोदकैरेतान् संक्लेद्य क्रमशः कृतिः ।। १०७।। जल वाले स्थान पर उपर्युक्त पदार्थों को पर्याप्त मोटा लगाना चाहिये। इन्हें बन्धोदक से गीला कर यदि छः मास के लिये छोड़ दिया जाय तो उत्तम परिणाम प्राप्त होता है ( इससे ईंटों की जोड़ाई अत्यधिक दृढ़ होती है )। चार मास छोड़ने पर मध्यम एवं दो मास छोड़ने पर कम परिणाम प्राप्त होता है ।। १०६-१०७।। लुपोपरिष्टकास्तारे चैवं चूर्णक्रियां पुनः । आच्छादनीयं यत्नेन तद्घनं छादनं विदुः ।। १०८ ।। लुपाओं के ऊपर ईंटों को बिछाना चाहिये एवं उसके ऊपर चूना डालना चाहिये। छत को प्रयत्नपूर्वक ( पूर्वोक्त लेप से ) घना आच्छादित करना चाहिये ।।१०८ ।। ✹ चित्रकर्म ✹ देवानां च द्विजानां चावासे योग्यं सनातनम् । बहिरन्तश्च सर्वेषां चित्रं युञ्जीत बुद्धिमान् ।। १०९।। देवताओं एवं ब्राह्मणों के सभी भवनों के भीतर एवं बाहर बुद्धिमान व्यक्ति को चित्रों से युक्त करना चाहिये।।१०९।। सुमङ्गलकथोपेतं श्रद्धानृत्तक्रियान्वितम् । विप्रादीनां च वर्णानां निवासं सम्पदां पदम् ।।११०।। विप्र आदि सभी वर्ण वालों के गृहों में माङ्गलिक कथाओं से युक्त, श्रद्धा, नृत्य मय०-१४

२१० मयमतम् एवं नाटक आदि के चित्र बनाने चाहिये। ये चित्र गृहस्वामी को समृद्धि प्रदान करने वाले होते हैं॥११०॥ संग्रामं मरणं दुःखं देवासुरकथान्वितम्। नग्नं तपस्विलीलां चामयाव्यादि न योजयेत् ॥१११॥ अन्येषामन्यथा वासे साधनीयं यथेष्टतः । युद्ध, मृत्यु, दुःख से युक्त देवासुर की कथा का चित्रण, नग्न, तपस्वियों की लीला तथा रोगियों-दुःखियों का अङ्कन नहीं करना चाहिये। अन्य लोगों के निवास- स्थान में उनकी इच्छानुसार अङ्कन करना चाहिये॥१११॥ पञ्चांशं माषयूषं स्यान्नवाष्टांशं गुडं दधिः ॥११२॥ आज्यं द्व्यंशं तु सप्तांशं क्षीरं चर्म षडंशकम् । त्रैफलं दशभागं स्यान्नालिकेरं युगांशकम् ॥११३॥ क्षौद्रमेकांशकं त्र्यंशं कदलीफलमिष्यते । लब्धे चूर्णे दशांशे तु युञ्जीतव्यं सुबन्धनम् । सर्वेषामधिकं शस्तं गुडं च दधि दुग्धकम् ॥११४॥ (अच्छे सुबन्धन के लिये ) पाँच भाग उड़द का पानी, नौ भाग गुड़, आठ भाग दही, दो भाग घी, सात भाग क्षीर, छः भाग चर्म, दश भाग त्रिफला, चार भाग नारियल का पानी, एक भाग शहद एवं तीन भाग केला होना चाहिये। इनमें दश भाग चूना मिलाने से सुबन्धन (अच्छा मसाला, लेप ) प्राप्त होता है। इन सभी पदार्थों में गुड़, दही एवं दूध अधिक होना चाहिये॥११२-११४॥ चूर्णद्व्यंशं करालं मधुघृतकदलीनालिकेरं च माषं शुक्तेस्तोयं च दुग्धं दधिगुड़सहितं त्रैफलं तत् क्रमेण । लब्धे चूर्णे शतांशेऽशकमिदमधुना चानुवृद्धिं प्रकुर्या- देतद् बन्धं दृषद्सदृशमिति कथितं तन्त्रविद्भिर्मुनीन्द्रैः ॥११५॥ दो भाग चूना, कराल, मधु, घी, केला, नारियल, उड़द, शुक्ति (सीपी) का जल, दूध, दही, गुड़ एवं त्रिफला—इनसे प्राप्त चूर्ण में इनके सौवें भाग के बराबर चूना मिलाना चाहिये। इस विधि से तैयार बन्ध (ईंटों को जोड़ने का गारा) पत्थर के समान दृढ़ होता है—ऐसा तन्त्र के ज्ञाता ऋषियों का कथन है॥११५॥ ❋ मूर्ध्नेष्टका ❋ देवानां द्विजभूमीशवैश्यानां भवनेऽधुना ॥११६॥

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २११ मूर्ध्नेष्टका विधातव्याश्चतस्रो लक्षणान्विताः । सुस्निग्धाः समदग्धाश्च सुस्वनास्ताः सुशोभनाः ॥११७॥ शिरोभाग की ईंट—अब देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के भवन में मूर्ध्नेष्टका (भवन के ऊर्ध्व भाग में रक्खी जाने वाली इष्टका) रक्खी जानी चाहिये। इसे चार लक्षणों से युक्त होना चाहिये—ये चिकनी हों, भली-भाँति पकी हों, (ठोंकने पर) इससे सुन्दर स्वर उत्पन्न हो तथा देखने में सुन्दर हों।।११६-११७।। स्त्रीलिङ्गाश्चापि पुंल्लिङ्गा भिन्नच्छिद्रादिवर्जिताः । विस्तारायामतीवैस्तु प्रथमेष्टकया समाः ॥११८॥ ये ईंटें स्त्रीलिङ्ग अथवा पुंल्लिङ्ग होनी चाहिये। ये टूटी न हों तथा छिद्र आदि से रहित हों। लम्बाई, चौड़ाई एवं मोटाई में ये प्रथम ईंटों (शिलान्यास की ईंटों) के समान होती हैं।।११८।। शिलामये शिला प्रोक्ता सर्वदोषविवर्जिता । जन्माद्याशिखरान्तं च यैर्द्रव्यैश्च विनिर्मितम् ॥११९॥ तैरेवादौ तथान्ते च न्यस्तव्याश्चेष्टकाः शुभाः । मिश्रद्रव्यैश्च सङ्कीर्णे यैर्द्रव्यैरुपरी स्थितम् ॥१२०॥ तैरेव मूर्ध्नि विन्यासं रहस्यमिदमीरितम् । प्रस्तर से निर्मित भवन में शिला को सभी दोषों से रहित होना चाहिये। जन्म (नींव) से लेकर शिखर के अन्तिम भाग तक भवन जिस द्रव्य से निर्मित होता है, उसी द्रव्य (ईंटों अथवा शिलाओं) से निर्मित इष्टका को भवन के प्रारम्भ एवं अन्तिम भाग (शिखर) में भी स्थापित करना चाहिये। यह प्रशस्त होता है। मिश्रित द्रव्यों से निर्मित भवन में ऊपरी भाग में जो द्रव्य ऊपर स्थित हो, उसी द्रव्य का विन्यास भवन के ऊपरी भाग में करना चाहिये। यह रहस्य (ऋषियों द्वारा) कहा गया है। ✵ स्तूपिकाकीलम् ✵ लोहजं दारुजं वाऽपि स्तूपिकाकीलमिष्यते ॥१२१॥ स्तूपिका की कील—स्थूपिका (स्तूपिका) की कील धातुनिर्मित या काष्ठनिर्मित होनी चाहिये।।१२१।। ऊर्ध्वभूम्यङ्घ्रिणायामविस्तारं पादतः समम् । अग्रमङ्गुलविस्तारमानुपूर्व्या कृशं तथा ॥१२२॥ कील की चौड़ाई ऊर्ध्व भाग एवं अधोभाग में समान होनी चाहिये। इसकी लम्बाई

२१२ मयमतम् ( ऊपरी मञ्जिल के ) स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये तथा अग्र भाग ( ऊपरी भाग का अन्तिम भाग ) एक अङ्गुल चौड़ा एवं नीचे की अपेक्षा पतला होना चाहिये।।१२२।। चतुरस्रसमं कुर्यात् त्रिभागैकमधस्तथा। वृत्तमूर्ध्वमधः कुर्याच्छिखिपादं न्यसेदधः ॥१२३॥ कील के नीचे का एक-तिहाई भाग चौकोर होना चाहिये तथा उसके ऊपर गोलाकार होना चाहिये। इसके निचले भाग में मोर के पैर की आकृति होनी चाहिये। विस्तारत्रिगुणायामं व्यासोच्चं पादतः समम्। अभ्रभं तु यथा भूमौ पञ्चमूर्तिसमन्वितम् ॥१२४॥ इसकी लम्बाई चौड़ाई की तीन गुनी होनी चाहिये एवं चौड़ाई ऊपरी स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये। यह भूमि पर दृढ़तापूर्वक टिका रहे एवं इसे पञ्चमूर्तियों से युक्त होना चाहिये।।१२४।। अथवा तच्छिखायामद्विगुणं कीलदैर्घिकम्। स्तम्भव्यासार्धविस्तारत्रिचतुर्भागमेव वा ॥१२५॥ अथवा स्तूपिका-कील की लम्बाई भवन की शिखा की लम्बाई से दुगुनी तथा चौड़ाई स्तम्भ के व्यास की आधी, तीसरे अथवा चौथे भाग के बराबर होनी चाहिये। अग्रमर्धाङ्गुलव्यासं शिखिपादं यथाबलम्। शिखराकृतिवत् कीलं लिङ्गच्छन्दमथापि वा ॥१२६॥ एवं त्रिधा समुद्दिष्टं स्तूपिकाकीलमार्यकैः। यदि कील के अग्र भाग का व्यास आधा अङ्गुल हो तो मयूर-पाद बल की आवश्यकता के अनुसार रखना चाहिये। शिखर की आकृति के अनुसार कील की आकृति अथवा लिङ्ग की आकृति का स्तूपिका-कील निर्मित होना चाहिये। इस प्रकार तीन प्रकार के स्तूपिका-कील का वर्णन विद्वानों ने किया है।।१२६।। ✺ मूर्ध्वेष्टकादिस्थापनम् ✺ सद्मनश्चोत्तरे पार्श्वे मण्डपे तु सुसंस्कृते ॥१२७॥ चतुष्प्रदीपसंयुक्ते वस्त्रैश्च परिवेष्टिते। सर्वमङ्गलसंयुक्ते शुद्धशाल्यास्तरे शुभे ॥१२८॥ स्थण्डिले चण्डितं कृत्वा मण्डूकं वाथ तत्परम्। विन्यस्य देवान् ब्रह्मादीन् श्वेततण्डुलधारया ॥१२९॥ मूर्ध्वेष्टका आदि की स्थापना—गृह के उत्तरी भाग में मण्डप को स्वच्छ

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१३ करके, चार दीपों से युक्त, वस्त्रों से आच्छादित करके सभी मंगल पदार्थों से युक्त करना चाहिये। शुद्ध शालिधान्य को बिछा कर स्थण्डिल वास्तुमण्डल अथवा मण्डूक वास्तु- मण्डल निर्मित करना चाहिये। इसके पश्चात् वास्तुमण्डल में ब्रह्मा आदि देवों का विन्यास कर उनको श्वेत तण्डुल ( अक्षत ) समर्पित करना चाहिये।। १२७-१२९।। आराध्य गन्धपुष्पाद्यैर्भुवनाधिपतिं जपेत्। देवताभ्यो बलिं दत्त्वा तत्तन्नाम्ना यथाविधि ॥१३०॥ गन्ध तथा पुष्प आदि से गृह-देवता की पूजा एवं स्तवन करना चाहिये। देवताओं को उनके नाम से विधिपूर्वक बलि प्रदान करनी चाहिये।।१३०।। स्थपतिः कलशान् न्यस्य पञ्च पञ्च सलक्षणान् । सुगन्धोदकसम्पूर्णान् पञ्चरत्नसमायुतान् ॥१३१॥ ससूत्रान् वस्त्रकूर्चालान् सापिधानान् सहेमकान् । उपपीठांशदेवानां स्वस्वनाम्नाभिधाय च ॥१३२॥ प्रणवादिनमोऽन्तेन गन्धाद्यैरर्चयेत् क्रमात्। स्थपति को पच्चीस सुन्दर लक्षणों वाले कलश स्थापित करने चाहिये। इन कलशों में सुगन्धित जल भरना चाहिये तथा पाँच रत्नों को डालना चाहिये। सूत्र, वस्त्र, कूर्च तथा स्वर्ण से युक्त करके इन कलशों को ढँक देना चाहिये। उपपीठ संज्ञक वास्तुमण्डल में देवों को उनके नाम से आहूत कर 'ॐ' से प्रारम्भ कर 'नमः' से अन्त करते हुये उन देवों की गन्ध आदि से क्रमशः पूजा करनी चाहिये।।१३१-१३२।। प्रक्षाल्य पञ्चगव्यैस्तु नवरत्नकुशोदकैः ॥१३३॥ इष्टकाश्च यथाकीलं सूत्रैरावेष्टयेत् क्रमात्। कुम्भस्य दक्षिणे शुद्धशालीस्थण्डिलमण्डले ॥१३४॥ इष्टकाओं एवं कील को पञ्चगव्य से, नवरत्नों एवं कुशा के जल से प्रक्षालित करके क्रमशः सूत्रों से लपेटना चाहिये। प्रत्येक कुम्भ के दाहिने भाग में शुद्ध शालि- धान्य के द्वारा निर्मितस्थण्डिल वास्तुमण्डल में— ॥१३३-१३४॥ आराध्य गन्धपुष्पैश्च बलिं दत्त्वा यथाविधि। इष्टकाश्चैव कीलांश्च वेष्टयेदम्बरैः शुभैः ॥१३५॥ वास्तुदेवों की पूजा गन्ध एवं पुष्पों से करके एवं उन्हें विधि के अनुसार बलि प्रदान कर ईंटों एवं कीलों को शुभ वस्त्र से लपेटना चाहिये।।१३५।। श्वेतवस्त्रास्तरस्योर्ध्वे न्यसेद् दर्भास्तरे शुचिः। स्थपतिर्वरवेषाढ्यः शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥१३६॥

२१४ मयमतम् सितवस्त्रपरिच्छिन्नोत्तरीयो हैममुद्रिकः । पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत् सुधीः ॥१३७॥ श्वेत वस्त्र के आस्तरण ( चादर, बिछा वस्त्र ) के ऊपर बिछे हुये पवित्र कुश पर इष्टका एवं कीलों को रखना चाहिये। स्थपति को अच्छा वेष, श्वेत पुष्पों की माला, श्वेत ( चन्दन ) का लेप, श्वेत वस्त्र के उत्तरीय को ऊपर ओढ़ कर तथा सुवर्णनिर्मित अंगूठी धारण कर शुद्ध जल पीना चाहिये तथा रात्रि में उपवास रखते हुये वहीं निवास करना चाहिये।।१३६-१३७।। कलशस्योत्तरे पार्श्वे सितवस्त्रपरिस्तरे । ततः प्रभाते विमले नक्षत्रकरणान्विते ॥१३८॥ सुमुहूर्ते सुलग्ने च स्थपतिः स्थापकेन तु । पुष्पकुण्डलहारादिकटकैरङ्गुलीयकैः ॥१३९॥ पञ्चाङ्गभूषणैर्हैमनिर्मितैस्तु विभूषितः । हेमयज्ञोपवीतस्तु नववस्त्रपरिच्छदः ॥१४०॥ श्वेतानुलेपनश्चैव सितपुष्पशिराः शुचिः । स्थपति को ( रात्रि में ) कलश के उत्तरी भाग में श्वेत वस्त्र के बिस्तर ( अथवा चादर, बिछावन ) पर रहना चाहिये। इसके पश्चात् प्रभात वेला में शुद्ध नक्षत्र एवं करण में, सुन्दर मुहूर्त एवं शुभ लग्न में स्थपति को स्थापक ( भवन-स्वामी ) के साथ पुष्प, कुण्डल, हार, कटक ( हाथ के आभूषण ) एवं अंगूठी—इन पाँच अंगों के सुवर्ण- निर्मित आभूषणों से अलङ्कृत होकर सुवर्ण-निर्मित जनेऊ तथा नवीन वस्त्र का परिच्छद ( ओढ़ने का वस्त्र ) धारण करना चाहिये। श्वेत लेप तथा सिर पर सफेद पुष्प धारण करना चाहिये एवं पवित्र होना चाहिये।।१३८-१४०।। ध्यात्वा धरातलं सर्वं दिग्द्विपेन्द्रसमायुतम् ॥१४१॥ ससागरं सशैलेन्द्रमनन्तस्योपरि स्थितम् । सृष्टिस्थितिलयाधारं भुवनाधिपतिं जपेत् ॥१४२॥ ( पवित्र तन एवं मन से ) दिशाओं के गजों, समुद्रों एवं पर्वतों से युक्त तथा अनन्त सर्प पर स्थित पृथिवी का ध्यान करते हुये सृष्टि, स्थिति एवं प्रलय के आधार, भुवनों के अधिपति देवता का जप ( स्तुति ) करना चाहिये।।१४१-१४२।। स्नापयित्वेष्टकाकीलं पूर्वोक्तैः कलशोदकैः । आराध्य गन्धपुष्पैश्च धूपदीपसमन्वितैः ॥१४३॥

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१५ पूर्ववर्णित कलशों के जलों से इष्टका एवं कील को स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप एवं दीप से वास्तुदेवों की पूजा करनी चाहिये।।१४३।। बलिं दत्त्वा यथान्यायं जयशब्दादिमङ्गलैः । विप्रस्वाध्यायघोषैश्च शङ्खभेर्यादिनिःस्वनैः ॥१४४॥ स्थापयेदिष्टकाः सम्यक् पूर्वदक्षिणतः क्रमात् । शिखरार्धे विमानस्य गग्रपत्रान्तरेऽपि वा ॥१४५॥ नियमानुसार वास्तुदेवों को बलि प्रदान कर जय आदि मङ्गल शब्दों, ब्राह्मणों द्वारा किये जा रहे वेदपाठ एवं शङ्ख तथा भेरी आदि वाद्यों की ध्वनि के साथ मूर्ध्नेष्टका को क्रमानुसार पूर्व से दक्षिण क्रम में स्थापित करना चाहिये। इसे विमान ( भवन ) के शिखर के अर्ध भाग में अथवा गग्र एवं पत्र के मध्य में स्थापित करना चाहिये। शिखरत्रिचतुर्भागावसाने वाम्बुजादधः । तदाद्यात् स्तूपिकायामात् कीलदैर्घ्यं प्रगृह्यताम् ॥१४६॥ शिखर के तीसरे अथवा चौथे भाग के अन्त तक, पद्म के नीचे से, स्तूपिका ( स्तूपिका ) की लम्बाई से कील की लम्बाई ग्रहण करनी चाहिये।।१४६।। पूर्वमेवेष्टकास्थानं निश्छिद्रं तु दृढीकृतम् । तन्मध्ये नवरत्नानि विन्यसेच्च यथाक्रमम् ॥१४७॥ इष्टका के स्थान को पहले ही छिद्ररहित एवं दृढ़ कर देना चाहिये; साथ ही उसके मध्य में नवरत्नों को क्रमानुसार रखना चाहिये।।१४७।। ऐन्द्रे मरकतं विद्याद् वैडूर्य वह्निगोचरे । इन्द्रनीलं तु याम्यायां मौक्तिकं पितरि स्मृतम् ॥१४८॥ इन्द्र के पद पर मरकत मणि, अग्नि के पद पर वैडूर्य मणि, यम के स्थान पर इन्द्रनील मणि एवं पितृपद पर मोती स्थापित करना चाहिये।।१४८।। वारुणे स्फाटिकं विद्यान्महानीलं समीरणे । वज्रं तु सौम्यदेशे स्यादैशान्यां तु प्रवालकम् ॥१४९॥ वरुण के स्थान पर स्फटिक, वायु के स्थान पर महानील मणि, सोम के पद पर वज्र ( हीरा ) तथा ईशान में प्रवाल ( मूँगा ) स्थापित करना चाहिये।।१४९।। माणिक्यं मध्यमे भागे हाटकं च विनिक्षिपेत् । रसोपरसबीजैश्च धान्यान्यप्यौषधानि च ॥१५०॥ मध्य भाग में माणिक्य, सोना, रस ( धातुनिर्मित अन्न के दाने ), उपरस ( रंगे

२१६ मयमतम् हुये पदार्थ ), बीज, धान्य ( अन्न ) एवं औषध ( जड़ी ) डालना चाहिये।।१५०।। तदूर्ध्वे स्थूपिकाकीलं स्थापयेदचलं समम्। तस्मात् प्रकृतिभूम्यन्तमुदग्दिशि महाध्वजम् ।।१५१।। उसके ऊपर बराबर एवं स्थिर करते हुये स्तूपिका-कील स्थापित करना चाहिये। इससे निचली भूमि तक उत्तर दिशा में महाध्वज स्थापित होता है।।१५१।। ग्रथितं क्षौमवस्त्रैश्च कार्पासैर्वा मनोहरैः। लम्बयेत्तदुदक्प्राच्यो प्रागुदग्वि दिशं ततः ।।१५२।। संस्पृशेद् यदि सर्वेषां प्राणिनां सम्पद्वृद्धये । इसे रेशमी वस्त्र अथवा सूती वस्त्र से निर्मित सुन्दर ( ध्वज ) ईशान कोण में लटकाना चाहिये। यदि यह ईशान कोण की भूमि को छूता है तो वह भवन सभी ( वर्णों ) के प्राणियों के लिये सम्पत्ति एवं समृद्धिकारक होता है।।१५२।। भवनं स्थूपिकीलं च पट्टैरावेष्ट्य शुभ्रकैः ।।१५३।। चतुर्दिक्षु चतुर्गाश्च सवत्साः सन्निवेशयेत्। द्वारालङ्करणं कुर्यात् सुविचित्राम्बरैर्नवैः ।।१५४।। भवन के स्थूपिकील ( स्तूपिका-कील ) को श्वेत वस्त्रों से लपेट कर चारो दिशाओं में बछड़ों के साथ चार गायें रखनी चाहिये। द्वार को नये रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजाना चाहिये।।१५३-१५४।। ☸ दक्षिणादानम् ☸ यजमानो विशुद्धात्मा प्रणम्य शिरसा गुरुम्। विमानस्थूपिकास्तम्भद्वारालङ्करणानि च ।।१५५।। वस्त्राणि धनधान्यैश्च पशूनपि सवत्सकान्। मुदा स्थपतये दत्त्वा शेषान् भक्त्या तु तर्पयेत् ।।१५६।। दान-दक्षिणा- यजमान ( गृहस्वामी ) को शुद्ध मन-मस्तिष्क से गुरु ( प्रधान आचार्य ), विमान ( भवन या मन्दिर ), स्थूपिका ( स्तूपिका ), स्तम्भ, द्वार एवं सज्जा को प्रणाम कर प्रसन्न भाव से स्थपति को वस्त्र, धन, अन्न एवं बछड़े सहित पशु ( गाय ) प्रदान करना चाहिये एवं शेष ( उसके सहायकों ) को भक्तिपूर्वक ( धनादि द्वारा ) तृप्त करना चाहिये।।१५५-१५६।। ☸ रत्नादिस्थानम् ☸ एवं मुनिवरैः प्रोक्तं प्रसादानां तु मूर्धनि। हर्म्याणां गर्भसंयुक्तौ नेत्रभित्तौ तलान्तरे ।।१५७।।

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१७ मण्डपे मध्यदेशे तु सभादीनामधोऽम्बुजात्। प्रासादवद् विधातव्यं गोपुराणां तु मूर्धनि ॥१५८॥ रत्न आदि का स्थान—इस प्रकार प्रासादों के शिरोभाग में, भवन के शिलान्यास से जुड़े भित्तियों में, प्रत्येक तल के बीच में, मण्डप में, मध्य भाग में, सभागार आदि में, शिखर पर स्थित पद्म के नीचे एवं गोपुर द्वारों के शीर्ष भाग में प्रासाद के सदृश रत्नादि स्थापित करना चाहिये—ऐसा श्रेष्ठ मुनियों का वचन है॥१५७-१५८॥ ❋ कर्मसमाप्तिः ❋ एवं तु विधिना सम्यक् सम्पन्नं सम्पदां पदम्। येन यत् कर्म चारब्धमादौ तदवसानके ॥१५९॥ कार्य की समाप्ति—इस प्रकार भवन-निर्माण के प्रारम्भ में एवं अन्त में विधिपूर्वक सभी क्रियायें सम्पन्न करने से गृह में सम्पदा आती है॥१५९॥ तेनैव निष्ठितं कर्म श्रीसौभाग्यायुरेधनम्। तस्याभावे तु तत्पुत्रः शिष्यो वा तं गुरुं पटे ॥१६०॥ लिखित्वा तन्नियोगेन सर्वकर्म समाचरेत्। अज्ञानात् त्वरितेनापि यद्वस्त्वन्येन भावितम्। करोति स्वामिनं शीघ्रमन्यथेति ह निश्चयः ॥१६१॥ गृहस्वामी के द्वारा विधिपूर्वक किया गया कर्म श्री, सौभाग्य, आयु एवं धन प्रदान करता है। गृहस्वामी के अभाव में उसका पुत्र अथवा शिष्य उसकी आकृति को वस्त्र पर रेखाङ्कित कर उसके (वस्त्र पर अंकित चित्र के) द्वारा सभी कार्यों को सम्पन्न करे। अन्य व्यक्ति के द्वारा किया गया कार्य यदि शीघ्रता अथवा अज्ञानतावश सही रीति से नहीं होता है तो गृहस्वामी को विपरीत परिणाम प्राप्त होता है॥१६०-१६१॥ प्रथमं कृतवान् विधिं यथावत् कृतवानेव करोति निष्ठितान्तम्। अथ वा विधिरन्यथा भवेच्चे- दशुभं स्वामिनमन्यथा करोति ॥१६२॥ गृहकर्ता जिस विधि से कार्य का प्रारम्भ करे, उसी विधि से कार्य करते हुये समापन करना चाहिये। यदि बीच में अन्य विधि का अनुसरण किया जाय तो गृहस्वामी का अशुभ होता है॥१६२॥ एवं ग्रीवालङ्कृतं पुष्कराभं मानं मल्लानां शिखाभूषणं च।

२१८ मयमतम् युक्त्या सर्वेषां करालादिबन्धं प्रोक्तं सम्यक् चेष्टकाबन्धमूर्ध्वे ॥१६३॥ इस प्रकार अलङ्कारों से युक्त ग्रीवा, पद्म की आकृति, मल्लों का प्रमाण एवं शीर्ष-स्थान के अलङ्करण का निर्माण करना चाहिये। उचित रीति से कराल आदि से बन्ध ( ईंटों को जोड़ने का गारा ) बना कर ऊर्ध्व भाग में भली-भाँति ईंटों को जोड़ना चाहिये।। १६३ ।। ⁕ स्तूपिकीलवृक्षाः ⁕ खदिरसरलसालस्तम्बकाशोकवृक्षाः पनसतितिमिसनिम्बाः सप्तपर्णाश्च सर्वे । परुषवकुलवह्विक्षीरिणीत्येवमाद्याः सुदृढविमलसाराः स्तूपिकीलाः प्रसिद्धाः ॥१६४॥ स्तूपिका-कील के वृक्ष—स्तूपिकील के लिये प्रसिद्ध वृक्ष कत्था, चीड़, साल, स्तबक, अशोक, कटहल, तिमिस, नीम, सप्तपर्ण—ये सभी वृक्ष तथा परुष, वकुल, वहिन

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१९ सुन्दर वस्त्र से तथा श्वेत पुष्पों से सजा कर मण्डप को मनोहर बनाना चाहिये।।१६७।। तस्य मध्ये तु शालीभिः स्थण्डिलं दण्डमानतः ॥१६८॥ उसके मध्य भाग में शालिधान्य से एक दण्ड प्रमाण का स्थण्डिल वास्तुमण्डल निर्मित करना चाहिये ।।१६८।। कृत्वाष्टाष्टपदं न्यस्य ब्रह्मादीन् वस्तुनायकान् । श्वेततण्डुलधाराभिर्विन्यस्याराध्य पुष्पकैः ॥१६९॥ गन्धैर्धूपैश्च दीपैश्च बलिं दत्त्वा विधानतः । तदूर्ध्वं पञ्चपञ्चैव कलशान् वस्त्रशोभितान् ॥१७०॥ चौंसठ पद बनाकर श्वेत चावल से ब्रह्मा आदि वास्तुदेवताओं को क्रमानुसार स्थापित कर तथा पुष्प-गन्ध-धूप-दीप आदि से उनकी पूजा कर उन्हें विधिपूर्वक बलि प्रदान करनी चाहिये। इसके ऊपर वस्त्रों से सुशोभित पच्चीस कलश रखना चाहिये। मणिहेमसमायुक्तान् ससूत्रान् सापिधानकान् । निष्कलङ्कान्सुषिरान् हाटकोदकपूरितान् ॥१७१॥ उपपीठपदस्थांस्तान् स्वस्वनाम्नाभिधाय च। ओङ्कारादिनमोऽन्तेन चार्चयित्वा न्यसेत्ततः ॥१७२॥ इन कलशों को रत्नों, सुवर्ण, सूत्रों एवं ढक्कनों से युक्त करना चाहिये। ये कलश दोषरहित, छिद्ररहित एवं हाटक-जल ( सुनहरा, पीला जल ) अथवा धतूरायुक्त जल से भरे होने चाहिये। उपपीठ वास्तुमण्डल पर रक्खे गये प्रत्येक घट को उस-उस वास्तुदेवता ( जिसके पद पर कलश हो ) का नाम लेते हुये ओंकार से प्रारम्भ कर नमः से अन्त करते हुये वास्तुदेवता की पूजा ( आवाहन करते हुये ) करनी चाहिये। कलशस्योत्तरे पार्श्वे दर्भासनपरिस्तरे । चतुष्प्रदीपसंयुक्ते सर्वमङ्गलशोभिते ॥१७३॥ पूतचेता विशुद्धात्मा स्थपतिर्व्रतमास्थितः । पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत्ततः ॥१७४॥ पवित्र मन एवं आत्मा वाले, व्रत में स्थित स्थपति को शुद्ध जल पीकर उपवास रखते हुये कलश के उत्तरी भाग में कुश के बिस्तर पर, जिसके चतुर्दिक चार दीपक जल रहे हों एवं जो माङ्गलिक पदार्थों से सुशोभित हो, रात्रि में निवास करना चाहिये।।१७३-१७४।। प्रासादस्याग्रतो यागमण्डपं विधिनाचरेत् । चतुर्द्वारसमायुक्तं चतुस्तोरणभूषितम् ॥१७५॥

२२० मयमतम् वासोभिर्दर्भमालाभिः स्रक्सुमैः समलङ्कृतम्। तन्मध्ये वेदिकां कुर्यात् तद्व्यासत्र्यंशमानतः ॥१७६॥ मन्दिर के अग्र भाग में विधिपूर्वक चार तोरणों से सुसज्जित, चार द्वारों से युक्त याग-मण्डप निर्मित करना चाहिये। इस यागमण्डप को वस्त्रों, कुशमालाओं एवं पुष्पों से अलङ्कृत करना चाहिये। इसके मध्य भाग में याग-मण्डप के विस्तार के तीसरे भाग के माप से वेदिका का निर्माण करना चाहिये।।१७५-१७६।। चतुरस्रं चतुर्दिक्षु विदिक्ष्वश्वत्थपत्रवत् । सुरेन्द्रेशानयोर्मध्ये कुण्डमष्टाश्रमिष्यते ॥१७७॥ त्रिमेखलासमायुक्तं वैकमेखलान्वितम् । चारों दिशाओं में चौकोर तथा दिक्कोणों में पीपल के पत्ते के सदृश कुण्ड निर्मित करना चाहिये। इन्द्र एवं ईशकोण के मध्य अष्टकोण का तीन मेखला अथवा एक मेखला से युक्त कुण्ड निर्मित करना चाहिये।।१७७।। ✴ कुम्भस्थापनम् ✴ स्थापको मूर्तिपैः सार्धं विधिना होममाचरेत् ॥१७८॥ शालिभिः स्थण्डिलं कृत्वा वेदिमध्ये विचक्षणः । मूर्तिकुम्भं न्यसेत् सम्यग् बीजमन्त्रमनुस्मरन् ॥१७९॥ कुम्भ की स्थापना—स्थापक को मूर्तिरक्षक के साथ विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। शालिधान्य द्वारा वेदि के मध्य में स्थण्डिल वास्तुमण्डल निर्मित कर बुद्धिमान व्यक्ति को बीज-मन्त्र का स्मरण करते हुये सम्यक् रीति से मूर्तिकुम्भ का न्यास करना चाहिये।।१७८-१७९।। प्रासादस्य चतुर्दिक्षु वृत्तकुण्डविधानतः । सन्तर्प्य स्थापको जातवेदसं निवसेत्तदा ॥१८०॥ प्रासाद के चारो दिशाओं में वृत्ताकार कुण्ड में स्थापक को विधिपूर्वक अग्नि स्थापित करनी चाहिये।।१८०।। विमानं जन्मतः स्तूपिकान्तं वस्त्रैर्निवेष्टयेत् । कुशास्तीर्णैर्नवैर्वस्त्रैः स्तूपिकीलमलङ्क्रियात् ॥१८१॥ विमान ( मन्दिर ) को जन्म ( प्रारम्भ ) से लेकर स्तूपिकापर्यन्त वस्त्रों से आवृत्त करना चाहिये। स्तूपिकील को कुशा से युक्त नवीन वस्त्र से सुसज्जित करना चाहिये।

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२१ ✵ वास्तुदेवताबलिः ✵ बल्यन्नं पायसान्नं च मुद्गान्नं च यवान्नकम्। कृसरं गुलशुद्धान्नं पीतं कृष्णं तथारुणम् ॥१८४२॥ गृहीत्वा सकलस्याग्रे हेमपात्रे निधाय च। दधिदुग्धघृतक्षौद्ररत्नपुष्पाक्षताम्बुभिः ॥१८४३॥ कदलीफलसंयुक्तं पात्रं चैवान्यशिल्पिभिः। धारयित्वाम्बुभी रात्रौ वास्तुदेवबलिं चरेत् ॥१८४४॥ स्थापक को बलि का अन्न, खीर, यव ( जौ ) से पका अन्न, खिचड़ी, गुड़ एवं शुद्ध अन्न ( चावल ), पीला, काला एवं लाल ( रंग में रंगा चावल )—ये सभी सामग्री सुवर्ण-पात्र में लेकर वास्तु-देवता के आगे रखकर दही, दूध, घी, शहद, रत्न, पुष्प, अक्षत एवं जल तथा केला से युक्त पात्र लेकर अन्य शिल्पियों के साथ रात्रि में इन पदार्थों के द्वारा वास्तुदेवता को बलि प्रदान करनी चाहिये।।१८४२-१८४४।। ✵ चक्षुर्मोक्षणम् ✵ ततः प्रभाते विमले नक्षत्रकरणान्विते। स्थपतिर्वरवेषाढ्यः प्राप्तपञ्चाङ्गभूषणः ॥१८४५॥ धृतहाटकयज्ञोपवीतः श्वेतानुलेपनः। श्वेतपुष्पशिरः प्राप्तोष्णीषश्चाहतवस्त्रयुक् ॥१८४६॥ दिशामूर्त्यपरांश्चक्षुर्मोक्षणं विधिनाचरेत्। स्नापयेत् कलशाम्भोभिरर्चयेद् गन्धपुष्पकैः ॥१८४७॥ आँख खोलना—इसके पश्चात् प्रातःकाल शुभ नक्षत्र एवं करण से युक्त वेला में स्थपति को सुन्दर वेष धारण कर, पाँचों अंगों में आभूषण धारण कर, सुवर्ण-निर्मित जनेऊ तथा श्वेत ( चन्दन ) का लेप धारण कर, शिर पर श्वेत पुष्प से युक्त पगड़ी तथा कोरे वस्त्र को पहन कर दिशा-मूर्तियों एवं अन्य ( मूर्तियों ) की ओर चक्षुर्मोक्षण ( आँख खोलने का कृत्य ) करना चाहिये एवं इन मूर्तियों को गन्ध एवं पुष्प से युक्त कलश के जल से स्नान कराना चाहिये।।१८४५-१८४७।। प्रथमं हेमया तत्र सूच्या नयनमण्डलम्। लिखित्वा तीक्ष्णशस्त्रेण मण्डलत्रयमुल्लिखेत् ॥१८४८॥ प्रथमतः सोने की सुई से नेत्र-मण्डल की आकृति बना कर ( तदनन्तर ) तीक्ष्ण शस्त्र से तीन ( नेत्र ) मण्डल निर्मित करना चाहिये।।१८४८।।

२२२ मयमतम् आच्छाद्य नववस्त्रेण ब्राह्मणान् धान्यसञ्चयान्। धेनुं सवत्सां कन्यां च दर्शयित्वा यथाक्रमम् ॥१८९॥ ब्राह्मणों के लिये नवीन वस्त्र से अन्न के ढेर को ढँक कर बछड़े सहित गाय एवं कन्या को क्रमशः दिखाना चाहिये॥१८९॥ ✺ सम्प्रोक्षणम् ✺ विमानं पुनरारुह्य स्थपतिः स्थापकाज्ञया। शङ्खकाहलतूर्यादिघोषैः स्वस्तिवाचनैः ॥१९०॥ स्तूप्यग्रादाप्रकृत्यन्तं चतुर्दिशि महाध्वजम्। लम्बयेत् क्षौमपट्टैर्वा कार्पासैर्ग्रथितं नरम् ॥१९१॥ सम्प्रोक्षण कार्य—इसके पश्चात् स्थापक की आज्ञा से शङ्ख, काहल (पीट कर बजाया जाने वाला वाद्य) तथा तूर्य आदि वाद्यों के स्वर एवं (ब्राह्मणों द्वारा किये जाने वाले) स्वस्ति-पाठ के साथ स्थपति को मन्दिर पर चढ़ा कर स्तूपिका से प्रारम्भ कर भूमि तक चारो दिशाओं में रेशमी अथवा सूती वस्त्र से निर्मित एवं नर (की आकृति से युक्त) ध्वज को लटकाना चाहिये॥१९०-१९१॥ चन्दनागुरुतोयेन सर्वगन्धोदकेन च। कलशोदैः कुशाम्भोभिरुपरिष्टात् समन्ततः ॥१९२॥ प्रोक्षयेत् स्थपतिः प्राज्ञो भुवनाधिपतिं जपेत्। बुद्धिमान स्थपति को चन्दन एवं अगुरु के जल से, सभी गन्धों से युक्त जल से, कलश के जल से एवं कुश के जल से ऊपर से चारो ओर प्रोक्षण करना चाहिये एवं संसार के स्वामी की स्तुति करनी चाहिये॥१९२॥ ✺ स्तूपिकुम्भः ✺ तैलतानां विमानानां पाञ्चभौतिकसंश्रितात् ॥१९३॥ स्तूपिकुम्भं सुवर्णेन ताम्रेण रजतेन वा। उपलेष्टकसौधैर्वा कृत्वेष्टं कीलवत् स्मृतम् ॥१९४॥ देवालयों में स्तूपिकुम्भ सुवर्ण, ताँबा, चाँदी, प्रस्तर, ईंट अथवा सुधा—इन पाँच पदार्थों के मिश्रण से निर्मित करना चाहिये। इसे कील के समान रखना चाहिये। सुसंस्थाप्याचलं यावत् प्रोक्षयेद् गन्धवारिणा। विमानादवरुह्याथ गर्भगृहं च मण्डपम् ॥१९५॥ प्रोक्षयित्वा मुखे स्थित्वा नत्वा देवं वदेदिदम्।

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२३ इसे स्थिर करते हुये स्थापित करके सुगन्धित जल से इसका प्रोक्षण करना चाहिये। विमान ( देवालय ) से उतरने के पश्चात् गर्भगृह एवं मण्डप का प्रोक्षण करना चाहिये तथा सम्मुख खड़े होकर वास्तुदेव को प्रणाम कर इस प्रकार कहना चाहिये। धाराधिपातात् सलिलप्रकोपाद् दंष्ट्र्या निपातात् पवनप्रकोपात् । अग्नेश्च दाहान्मुषितापचाराद् रक्षत्विदं सद्म शिवं च मेऽस्तु ॥१९६॥ ( हे ईश्वर ) इस भवन की गिरने से, जल के प्रकोप से, ( गजादि पशुओं के ) दाँत से गिरने से, वायु के प्रकोप से, अग्नि द्वारा जलने से एवं चोरों से रक्षा कीजिये और मेरा कल्याण कीजिये ।।१९६।। निरुजा मुदिता सधना प्रथिता यशसा महदद्भुतवीर्ययुता। सततं निरुपद्रवकर्मयुता पृथिवी पृथु जीवतु धर्मविधेः ॥१९७॥ रोगरहित, प्रसन्नता, धनयुक्त, कीर्ति का विस्तार करने वाली, बड़े चमत्कारों से एवं बल से युक्त, विना उपद्रव के निरन्तर कर्म से युक्त यह पृथिवी चिरकाल तक धर्मपूर्वक रहे ।।१९७।। ब्रह्मा विष्णुः शङ्करः सर्वदेवाः क्षोणी लक्ष्मीर्वाग्वधूः सिंहकेतुः । ज्येष्ठ विश्वेदेवदेव्यः प्रजानां श्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यं कृषीरन् ॥१९८॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सभी देवता, क्षोणी ( पृथिवी ), लक्ष्मी, वाग्वधू ( सरस्वती ), सिंहकेतु, ज्येष्ठा, विश्वेदेव तथा देवियाँ प्रजाजनों को श्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग प्रदान करें।।१९८।। उक्त्वैवं स्थपतेः कर्मण्यत्रैव परिनिष्ठिते ॥१९९॥ स्थापको विधिना शुद्धिं कुर्याद् यागादिकर्मभिः । प्रोक्षयित्वा घटाम्भोभिः पञ्चगव्यैः कुशोदकैः ॥२००॥ इस प्रकार कहने के पश्चात् स्थपति का कार्य पूर्ण हो जाता है। इसके पश्चात् स्थापक को विधि-पूर्वक यज्ञ आदि कार्य से तथा घट के जल, पञ्चगव्य एवं कुश के जल से प्रोक्षण कर ( विमान को ) शुद्ध करना चाहिये ।।१९९-२००।। अर्चयेद् गन्धपुष्पाद्यैर्नैवेद्यं च प्रदापयेत् । प्रासादबीजमन्त्रांस्तु न्यसेत् सौधाधिदेवताम् ॥२०१॥

२२४ मयमतम् स्थापक को गन्ध एवं पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिये तथा नैवेद्य प्रदान करना चाहिये; साथ ही देवालय के प्रधान देवता को निमित्त बना कर प्रासाद के बीज-मन्त्र का न्यास करना चाहिये॥२०१॥ ☀ दक्षिणादानम् ☀ प्रासादाभिमुखे स्थित्वा यजमानः प्रसन्नधीः। स्थपतेर्धर्मसर्वस्वं क्लेशेन सह यद् भवेत्॥२०२॥ तत् सर्वं परिगृह्णीत सुप्रीत्या स्थापकाज्ञया। पूजयेत्तु यथाशक्ति स्थापकं स्थपतिं ततः॥२०३॥ दक्षिणा एवं दान—प्रसन्न-मति यजमान देवालय के सम्मुख खड़े होकर स्थपति के सम्पूर्ण धर्म (उत्तरदायित्व) को, जो उसके ऊपर कष्ट के साथ थे, उन सबको प्रसन्न भाव से स्थापक की आज्ञा से ग्रहण करे एवं शक्ति के अनुसार स्थापक एवं स्थपति का सत्कार करे॥२०२-२०३॥ पुत्रभ्रातृकलत्रैश्च यजमानो मुदा धनैः। धान्यैश्च पशुभिर्वस्त्रैर्वाहनैर्भूमिदानकैः॥२०४॥ शेषानपि च तक्षादिविष्ठिसर्वान् स कर्मणि। सन्तर्पयेद्धिरणयैश्च वस्त्रैर्वाऽपि मनोहरैः॥२०५॥ अपने पुत्र, भाई एवं पत्नी के साथ यजमान धन, अन्न, पशु, वस्त्र, वाहन तथा भूमि के दान से एवं सोने तथा सुन्दर वस्त्रों से शेष तक्षक आदि सभी शिल्पियों को भी सन्तुष्ट करे॥२०४-२०५॥ विमानस्तूपिकास्तम्भमण्डपालङ्कृतान्यपि । वस्त्रादीनि ध्वजं धेनुं प्रीत्या स्थपतये ददेत्॥२०६॥ विमान, स्तूपिका (स्तूपिका), स्तम्भ एवं मण्डप को अलङ्करणों से युक्त, वस्त्रादि, ध्वज एवं गाय को प्रसन्न भाव से स्थपति को देना चाहिये॥२०६॥ ☀ सम्प्रोक्षणावश्यकता ☀ एवमेवं कृतं वस्तु वर्धयेन्नित्यमा युगात्। यजमानस्त्विहामुत्र फलं सम्यग् लभेद् दृढम्॥२०७॥ सम्प्रोक्षण की आवश्यकता—इस प्रकार से निर्मित वास्तु युगों तक नित्य वृद्धि को प्राप्त होता है। यजमान को इस लोक एवं परलोक में स्थिर फल भली-भाँति प्राप्त होता है॥२०७॥

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२५ अन्यथा चेत् फलं नैव लभते तत्र वस्तुनि । भूतप्रेतपिशाचादिराक्षसाश्च वसन्त्यलम् ॥२०८॥ तस्मात् प्रासादनिष्पन्ने सर्वथा प्रोक्षणं चरेत् । यदि वास्तु-कृत्य अन्य विधि से होता है तो वह वास्तु फलदायी नहीं होता है। उस भवन में भूत, प्रेत, पिशाच एवं राक्षस निवास करते हैं। इसलिये प्रासाद निर्मित हो जाने पर सब प्रकार से प्रोक्षण कर्म अवश्य करना चाहिये ॥२०८॥ मण्डपे च सभायां वा रङ्गे विहारशालके ॥२०९॥ हेमगर्भसभायां तु त्तुलाभारकूटके । विश्वकोष्ठे प्रपायां च धान्यागारे महानसे ॥२१०॥ वास्तुदेवबलिं दत्त्वाधिवास्य विधिना तथा । स्थपतिः पूतचित्तात्मा प्राप्तपञ्चाङ्गभूषणः ॥२११॥ नवाम्बरधरश्चैव नववस्त्रोत्तरीयकः । सर्वमङ्गलघोषैश्च जलसम्प्रोक्षणं चरेत् ॥२१२॥ मण्डप में, सभा में, रङ्गमण्डप में, विहारशाला में, हेमगर्भ के सभागार में, तुलाभारकूट में, विश्वकोष्ठ में, प्रपा ( जल का प्याऊ ) में, धान्यगृह में तथा रसोई में विधिपूर्वक वास्तुदेव को बलि प्रदान कर पवित्र चित्त एवं आत्मा से पाँच अङ्गों में आभूषण धारण कर, नवीन वस्त्र पहन कर तथा नवीन उत्तरीय ( ऊपर ओढ़ने का चादर ) धारण कर सभी प्रकार के मङ्गल-स्वर के साथ जलसम्प्रोक्षण कर्म सम्पन्न करना चाहिये ॥२०९-२१२॥ ✹ सम्प्रोक्षणकालः ✹ उत्तरायणमासे तु कृतं चेदुत्तमोत्तमम् । त्वरितेऽप्येवमेवं तु कुर्यात्तद् दक्षिणायने ॥२१३॥ सम्प्रोक्षण का समय—यदि सम्प्रोक्षण-कर्म उत्तरायण मासों में किया जाय तो अति उत्तम होता है। यदि शीघ्रता हो तो दक्षिणायन मासों में भी करना चाहिये।। २१३।। त्रिरात्रमेकरात्रं वा सद्योऽधिवासमेव वा । तत्रैवाविकले द्रव्ये लभेत् कर्ता महत् फलम् ॥२१४॥ कर्ता प्रासाद के पूरी तरह पूर्ण हो जाने पर तीन रात्रि, एक रात्रि अथवा उसी दिन वहाँ अधिवास करे तो वह महान् फल प्राप्त करता है।।२१४।। मय०-१५

२२६ मयमतम् ✴ कलशस्थापनम् ✴ एकत्रिपञ्चकलशेषु तथाऽधिदेवा एकत्रिपञ्च कथिता इह मूर्त्तयस्ताः । तत्तत् स्वमन्त्रसहितं तदधः सहेम- रत्नं निधाय विधिना कलशान्न्यसेत्तत् ॥२१५॥ देवालय में एक, तीन या पाँच देवतामूर्ति हों तो एक, तीन या पाँच कलशों में मन्त्रसहित उनके नीचे सुवर्ण के साथ रत्न को रखकर विधिपूर्वक कलशों का न्यास करना चाहिये।।२१५।। एवं मुदा भवनकर्मसमाप्तिमत्र कुर्याज्जनेशजनगोकुलसम्पद्वृद्ध्यै । यद्वैपरीत्यमसमाप्तिकवस्तुवेशं तद्वास्तुदेवबलिहीनमनर्थदं स्यात् ॥२१६॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे शिखरकरणभवनकर्म- समाप्तिविधानं नामाष्टादशोऽध्यायः इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक भवन का निर्माण पूर्ण होता है तो गृहस्वामी, उसके परिवार, उसके परिजन एवं उसके गायों के वंश की वृद्धि होती है। इसके विपरीत वास्तुकार्य सम्पन्न होने पर एवं वास्तुदेवता के बलि से रहित होने पर वह निर्मित भवन अनर्थकारी होता है।।२१६।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. गललक्षण ( श्लोक २-६ ) इसका वर्णन शिल्परत्न (पूर्व., ३१ अ.) में विस्तार से प्राप्त होता है। यहाँ गल के प्रमाण, प्रकार एवं मूषा आदि इस प्रकार वर्णित हैं— ऊर्ध्वभूमेः पादतुङ्गं गलमानमुदाहृतम्। आद्यङ्घ्रोनततुल्यं वा गलोन्नतमिहोच्यते।। तदुच्चात् त्रिचतुष्पञ्चभागैकं वेदिकोन्नतम्। शेषं गलोदयं ख्यातमशेषं वा गलोदयम्।। त्रिचतुष्पञ्चहस्तं वा गलव्यासमुदाहृतम्। अङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिप्रवेशं यत्तद्वद्वा गलवेशनम्।।