मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२३ इसे स्थिर करते हुये स्थापित करके सुगन्धित जल से इसका प्रोक्षण करना चाहिये। विमान ( देवालय ) से उतरने के पश्चात् गर्भगृह एवं मण्डप का प्रोक्षण करना चाहिये तथा सम्मुख खड़े होकर वास्तुदेव को प्रणाम कर इस प्रकार कहना चाहिये। धाराधिपातात् सलिलप्रकोपाद् दंष्ट्र्या निपातात् पवनप्रकोपात् । अग्नेश्च दाहान्मुषितापचाराद् रक्षत्विदं सद्म शिवं च मेऽस्तु ॥१९६॥ ( हे ईश्वर ) इस भवन की गिरने से, जल के प्रकोप से, ( गजादि पशुओं के ) दाँत से गिरने से, वायु के प्रकोप से, अग्नि द्वारा जलने से एवं चोरों से रक्षा कीजिये और मेरा कल्याण कीजिये ।।१९६।। निरुजा मुदिता सधना प्रथिता यशसा महदद्भुतवीर्ययुता। सततं निरुपद्रवकर्मयुता पृथिवी पृथु जीवतु धर्मविधेः ॥१९७॥ रोगरहित, प्रसन्नता, धनयुक्त, कीर्ति का विस्तार करने वाली, बड़े चमत्कारों से एवं बल से युक्त, विना उपद्रव के निरन्तर कर्म से युक्त यह पृथिवी चिरकाल तक धर्मपूर्वक रहे ।।१९७।। ब्रह्मा विष्णुः शङ्करः सर्वदेवाः क्षोणी लक्ष्मीर्वाग्वधूः सिंहकेतुः । ज्येष्ठ विश्वेदेवदेव्यः प्रजानां श्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यं कृषीरन् ॥१९८॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सभी देवता, क्षोणी ( पृथिवी ), लक्ष्मी, वाग्वधू ( सरस्वती ), सिंहकेतु, ज्येष्ठा, विश्वेदेव तथा देवियाँ प्रजाजनों को श्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग प्रदान करें।।१९८।। उक्त्वैवं स्थपतेः कर्मण्यत्रैव परिनिष्ठिते ॥१९९॥ स्थापको विधिना शुद्धिं कुर्याद् यागादिकर्मभिः । प्रोक्षयित्वा घटाम्भोभिः पञ्चगव्यैः कुशोदकैः ॥२००॥ इस प्रकार कहने के पश्चात् स्थपति का कार्य पूर्ण हो जाता है। इसके पश्चात् स्थापक को विधि-पूर्वक यज्ञ आदि कार्य से तथा घट के जल, पञ्चगव्य एवं कुश के जल से प्रोक्षण कर ( विमान को ) शुद्ध करना चाहिये ।।१९९-२००।। अर्चयेद् गन्धपुष्पाद्यैर्नैवेद्यं च प्रदापयेत् । प्रासादबीजमन्त्रांस्तु न्यसेत् सौधाधिदेवताम् ॥२०१॥