भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२२२ मयमतम् आच्छाद्य नववस्त्रेण ब्राह्मणान् धान्यसञ्चयान्। धेनुं सवत्सां कन्यां च दर्शयित्वा यथाक्रमम् ॥१८९॥ ब्राह्मणों के लिये नवीन वस्त्र से अन्न के ढेर को ढँक कर बछड़े सहित गाय एवं कन्या को क्रमशः दिखाना चाहिये॥१८९॥ ✺ सम्प्रोक्षणम् ✺ विमानं पुनरारुह्य स्थपतिः स्थापकाज्ञया। शङ्खकाहलतूर्यादिघोषैः स्वस्तिवाचनैः ॥१९०॥ स्तूप्यग्रादाप्रकृत्यन्तं चतुर्दिशि महाध्वजम्। लम्बयेत् क्षौमपट्टैर्वा कार्पासैर्ग्रथितं नरम् ॥१९१॥ सम्प्रोक्षण कार्य—इसके पश्चात् स्थापक की आज्ञा से शङ्ख, काहल (पीट कर बजाया जाने वाला वाद्य) तथा तूर्य आदि वाद्यों के स्वर एवं (ब्राह्मणों द्वारा किये जाने वाले) स्वस्ति-पाठ के साथ स्थपति को मन्दिर पर चढ़ा कर स्तूपिका से प्रारम्भ कर भूमि तक चारो दिशाओं में रेशमी अथवा सूती वस्त्र से निर्मित एवं नर (की आकृति से युक्त) ध्वज को लटकाना चाहिये॥१९०-१९१॥ चन्दनागुरुतोयेन सर्वगन्धोदकेन च। कलशोदैः कुशाम्भोभिरुपरिष्टात् समन्ततः ॥१९२॥ प्रोक्षयेत् स्थपतिः प्राज्ञो भुवनाधिपतिं जपेत्। बुद्धिमान स्थपति को चन्दन एवं अगुरु के जल से, सभी गन्धों से युक्त जल से, कलश के जल से एवं कुश के जल से ऊपर से चारो ओर प्रोक्षण करना चाहिये एवं संसार के स्वामी की स्तुति करनी चाहिये॥१९२॥ ✺ स्तूपिकुम्भः ✺ तैलतानां विमानानां पाञ्चभौतिकसंश्रितात् ॥१९३॥ स्तूपिकुम्भं सुवर्णेन ताम्रेण रजतेन वा। उपलेष्टकसौधैर्वा कृत्वेष्टं कीलवत् स्मृतम् ॥१९४॥ देवालयों में स्तूपिकुम्भ सुवर्ण, ताँबा, चाँदी, प्रस्तर, ईंट अथवा सुधा—इन पाँच पदार्थों के मिश्रण से निर्मित करना चाहिये। इसे कील के समान रखना चाहिये। सुसंस्थाप्याचलं यावत् प्रोक्षयेद् गन्धवारिणा। विमानादवरुह्याथ गर्भगृहं च मण्डपम् ॥१९५॥ प्रोक्षयित्वा मुखे स्थित्वा नत्वा देवं वदेदिदम्।