भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२१ ✵ वास्तुदेवताबलिः ✵ बल्यन्नं पायसान्नं च मुद्गान्नं च यवान्नकम्। कृसरं गुलशुद्धान्नं पीतं कृष्णं तथारुणम् ॥१८४२॥ गृहीत्वा सकलस्याग्रे हेमपात्रे निधाय च। दधिदुग्धघृतक्षौद्ररत्नपुष्पाक्षताम्बुभिः ॥१८४३॥ कदलीफलसंयुक्तं पात्रं चैवान्यशिल्पिभिः। धारयित्वाम्बुभी रात्रौ वास्तुदेवबलिं चरेत् ॥१८४४॥ स्थापक को बलि का अन्न, खीर, यव ( जौ ) से पका अन्न, खिचड़ी, गुड़ एवं शुद्ध अन्न ( चावल ), पीला, काला एवं लाल ( रंग में रंगा चावल )—ये सभी सामग्री सुवर्ण-पात्र में लेकर वास्तु-देवता के आगे रखकर दही, दूध, घी, शहद, रत्न, पुष्प, अक्षत एवं जल तथा केला से युक्त पात्र लेकर अन्य शिल्पियों के साथ रात्रि में इन पदार्थों के द्वारा वास्तुदेवता को बलि प्रदान करनी चाहिये।।१८४२-१८४४।। ✵ चक्षुर्मोक्षणम् ✵ ततः प्रभाते विमले नक्षत्रकरणान्विते। स्थपतिर्वरवेषाढ्यः प्राप्तपञ्चाङ्गभूषणः ॥१८४५॥ धृतहाटकयज्ञोपवीतः श्वेतानुलेपनः। श्वेतपुष्पशिरः प्राप्तोष्णीषश्चाहतवस्त्रयुक् ॥१८४६॥ दिशामूर्त्यपरांश्चक्षुर्मोक्षणं विधिनाचरेत्। स्नापयेत् कलशाम्भोभिरर्चयेद् गन्धपुष्पकैः ॥१८४७॥ आँख खोलना—इसके पश्चात् प्रातःकाल शुभ नक्षत्र एवं करण से युक्त वेला में स्थपति को सुन्दर वेष धारण कर, पाँचों अंगों में आभूषण धारण कर, सुवर्ण-निर्मित जनेऊ तथा श्वेत ( चन्दन ) का लेप धारण कर, शिर पर श्वेत पुष्प से युक्त पगड़ी तथा कोरे वस्त्र को पहन कर दिशा-मूर्तियों एवं अन्य ( मूर्तियों ) की ओर चक्षुर्मोक्षण ( आँख खोलने का कृत्य ) करना चाहिये एवं इन मूर्तियों को गन्ध एवं पुष्प से युक्त कलश के जल से स्नान कराना चाहिये।।१८४५-१८४७।। प्रथमं हेमया तत्र सूच्या नयनमण्डलम्। लिखित्वा तीक्ष्णशस्त्रेण मण्डलत्रयमुल्लिखेत् ॥१८४८॥ प्रथमतः सोने की सुई से नेत्र-मण्डल की आकृति बना कर ( तदनन्तर ) तीक्ष्ण शस्त्र से तीन ( नेत्र ) मण्डल निर्मित करना चाहिये।।१८४८।।