भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

२२० मयमतम् वासोभिर्दर्भमालाभिः स्रक्सुमैः समलङ्कृतम्। तन्मध्ये वेदिकां कुर्यात् तद्व्यासत्र्यंशमानतः ॥१७६॥ मन्दिर के अग्र भाग में विधिपूर्वक चार तोरणों से सुसज्जित, चार द्वारों से युक्त याग-मण्डप निर्मित करना चाहिये। इस यागमण्डप को वस्त्रों, कुशमालाओं एवं पुष्पों से अलङ्कृत करना चाहिये। इसके मध्य भाग में याग-मण्डप के विस्तार के तीसरे भाग के माप से वेदिका का निर्माण करना चाहिये।।१७५-१७६।। चतुरस्रं चतुर्दिक्षु विदिक्ष्वश्वत्थपत्रवत् । सुरेन्द्रेशानयोर्मध्ये कुण्डमष्टाश्रमिष्यते ॥१७७॥ त्रिमेखलासमायुक्तं वैकमेखलान्वितम् । चारों दिशाओं में चौकोर तथा दिक्कोणों में पीपल के पत्ते के सदृश कुण्ड निर्मित करना चाहिये। इन्द्र एवं ईशकोण के मध्य अष्टकोण का तीन मेखला अथवा एक मेखला से युक्त कुण्ड निर्मित करना चाहिये।।१७७।। ✴ कुम्भस्थापनम् ✴ स्थापको मूर्तिपैः सार्धं विधिना होममाचरेत् ॥१७८॥ शालिभिः स्थण्डिलं कृत्वा वेदिमध्ये विचक्षणः । मूर्तिकुम्भं न्यसेत् सम्यग् बीजमन्त्रमनुस्मरन् ॥१७९॥ कुम्भ की स्थापना—स्थापक को मूर्तिरक्षक के साथ विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। शालिधान्य द्वारा वेदि के मध्य में स्थण्डिल वास्तुमण्डल निर्मित कर बुद्धिमान व्यक्ति को बीज-मन्त्र का स्मरण करते हुये सम्यक् रीति से मूर्तिकुम्भ का न्यास करना चाहिये।।१७८-१७९।। प्रासादस्य चतुर्दिक्षु वृत्तकुण्डविधानतः । सन्तर्प्य स्थापको जातवेदसं निवसेत्तदा ॥१८०॥ प्रासाद के चारो दिशाओं में वृत्ताकार कुण्ड में स्थापक को विधिपूर्वक अग्नि स्थापित करनी चाहिये।।१८०।। विमानं जन्मतः स्तूपिकान्तं वस्त्रैर्निवेष्टयेत् । कुशास्तीर्णैर्नवैर्वस्त्रैः स्तूपिकीलमलङ्क्रियात् ॥१८१॥ विमान ( मन्दिर ) को जन्म ( प्रारम्भ ) से लेकर स्तूपिकापर्यन्त वस्त्रों से आवृत्त करना चाहिये। स्तूपिकील को कुशा से युक्त नवीन वस्त्र से सुसज्जित करना चाहिये।